संजय राऊत- कार्यकारी संपादक
२०२५, तूफानी घटनाओं से भरा यह साल अपने समापन पर है। जब प्रधानमंत्री मोदी ७५ वर्ष के हुए तब कई लोगों ने सोचा था कि वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे। लेकिन मोदी अभी भी वहीं हैं। देश का भविष्य चार लोगों के हाथों में है, यही भारतीय सामाजिक जीवन की त्रासदी है। अगर यह त्रासदी नए साल में तूफान की तरह प्रवेश कर रही है, तो आगे नया क्या होगा?
२०२५ का तूफानी घटनाओं से भरा साल बुधवार को अस्त हो रहा है। साल का एक पन्ना पलट गया है। नए साल का अर्थ केवल वैâलेंडर बदलना जितना आसान नहीं है। हम सब साल के आखिरी महीने में हैं। इस साल पूरी दुनिया में कई बदलाव हुए हैं। क्या हमारे प्रधानमंत्री नए साल में भारत में हैं, जनता के मन में यह सवाल उठा होगा। अगर प्रधानमंत्री मोदी भारत में होंगे तो हमें उन्हें नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं देनी चाहिए। साल के अंत में प्रधानमंत्री मोदी इथियोपिया में थे। ऐसे कई देशों में मोदी की गतिविधियां बढ़ गई हैं। १४० करोड़ की आबादी वाले भारत में उनके पैर टिकते नहीं और जिस देश की आबादी तकरीबन एक लाख है, प्रधानमंत्री मोदी वहां जाकर उस देश का सर्वोच्च ‘अवॉर्ड’ यानी नागरिक पुरस्कार लेकर लौटते हैं, साथ पहुंचते हैं और मोदी के अंधभक्त उनकी शान में कसीदे पढ़ते रहते हैं। अंध भक्तों ने इस देश को अंधकार में डुबो दिया है। यदि कोई इसी अंधकार में नव वर्ष में दीपक जलाने का प्रयास भी करे, तो देश में प्रकाश नहीं होगा। आज सर्वत्र इस तरह अंधकार छाया हुआ है।
२६ पर्यटकों की हत्या
बीतते साल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादियों ने हमला कर २६ पर्यटकों को मार डाला। भाजपा ने इस हमले का धार्मिक राजनीतिकरण किया और हमले का बदला लेने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम से सैन्य कार्रवाई की। उस कार्रवाई का अंत आखिर क्या हुआ, इस बाबत देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक नहीं बता सकते। ‘पाकिस्तान को सबक सिखाएंगे और पाकिस्तानी नियंत्रण में कश्मीर के हिस्से को वापस लेकर ही युद्ध खत्म करेंगे’ इस तरह गरजने वाली जुबानें अचानक बंद हो गईं। जब भारतीय सेना अपना पराक्रम दिखा रही थी, प्रधानमंत्री मोदी ने युद्धविराम की घोषणा कर दी और इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी थी। राष्ट्रपति ट्रंप अब तक सौ बार कह चुके हैं कि ‘व्यापार बंद कर देने’ की धमकी की वजह से भारत ने युद्ध रोका और भारत की तरफ से राष्ट्रपति ट्रंप का कोई प्रतिवाद नहीं किया गया। दुनिया ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने मोदी की झुकती हुई तस्वीर देखी है, जिन्होंने कहा था कि पाकिस्तान से लड़ने के लिए उन्हें ५६ इंच का सीना चाहिए। आज की भारतीय पीढ़ी को युद्ध क्या होता है इसका कोई अनुभव नहीं है। आज यह आवश्यक है कि मोदी सरकार को चर्चिल के आदर्शों का अनुसरण करवाया जाए, जिन्होंने इतिहास रचते हुए कहा था कि वीरता का कोई विकल्प नहीं है और कायर और भगोड़े कभी देश को नहीं बचा सकते। केवल अंधभक्तों की फौज को खिलाने का क्या लाभ? यहां तक कि सेना अधिकारी भी अंधभक्तों की तरह बोलने लगे हैं। हमारे लोगों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की तरह सिंध और बलूचिस्तान में प्रवेश करना चाहिए था, लेकिन ‘हम पाकिस्तान में घुसेंगे और मार डालेंगे’ केवल एक लफ्फाजी बनकर रह गया।
गुजरते साल के झटके
हालात ऐसे हैं कि हिंदुओं और हिंदू राष्ट्र के नाम पर चुनी गई मोदी सरकार वर्तमान में सत्ता में है और जब तक मतदाता के सिर पर धर्मांधता का भूत चढ़ा रहेगा, तब तक ‘मोदी’ पैटर्न की राजनीति अजेय बनी रहेगी। प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हुआ और बीतते साल में मंदिर पर धर्मध्वज फहराकर दुनियाभर के हिंदुओं को एक संदेश दिया। फिर भी मोदी और उनके लोग आज कहते हैं कि ‘हिंदू खतरे में हैं।’ मोदी और उनके अंधभक्तों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब देश में हिंदुत्ववादी सरकार है तो हिंदू वैâसे खतरे में हैं।
बीतते साल ने क्या दिया, क्या बोया इन पर गौर करें तो समझ पाएंगे कि देश किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
– जब लद्दाख के लोकनायक सोनम वांगचुक ने विकास के मुद्दे पर आंदोलन किया तो मोदी और शाह ने सीधे राजद्रोह के आरोप में वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया। वांगचुक की एकमात्र मांग थी कि भाजपा लद्दाख की जनता से किए गए वादों को पूरा करे। वांगचुक फिलहाल राजस्थान की जेल में हैं।
– चीन ने भारतीय सीमा में प्रवेश कर भूमि पर कब्जा कर लिया और भारत ने साधारण प्रतिरोध तक नहीं किया।
– ईरान-इजरायल युद्ध के दौरान ईरान ने इजरायल को झुका दिया। ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बम गिराए। ईरान ने किसी भी महाशक्ति के सामने झुकने से इनकार कर दिया और साहस एवं आत्मसम्मान का परिचय दिया। भारत ने इस मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाना पसंद किया।
– भाजपा सरकार ने रोजगार की गारंटी देने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ से महात्मा गांधी का नाम सीधे-सीधे हटा दिया। इस योजना को ‘जी रामजी’ के प्रचार नाम से शुरू किया गया था।
– बिहार विधानसभा में भाजपा और नीतीश कुमार ने एकतरफा जीत हासिल की। तेजस्वी यादव पचास सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके। भाजपा की जीत में चुनाव आयोग की अहम भूमिका रही।
– एयर इंडिया का एक विमान अमदाबाद हवाई अड्डे से लंदन जाते समय उड़ान भरने के दो मिनट बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह भयावह हादसा १२ जून, २०२५ को हुआ। इस दुर्घटना में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी समेत २३० यात्रियों की मौत हो गई। यह विमान दुर्घटना एक रहस्य बनी हुई है।
– उद्धव और राज ठाकरे मराठी के मुद्दे पर एक साथ आए और दोनों ने मुंबई, महाराष्ट्र और मराठी माणुस को उचित अधिकार दिलाने के लिए एक राजनीतिक गठबंधन की घोषणा की। इसे मराठी माणुस के जीवन का एक सौभाग्यशाली क्षण माना जाना चाहिए। ठाकरे बंधुओं का २० वर्षों के अलगाव के बाद पारिवारिक और राजनीतिक स्तर पर एक साथ आना महाराष्ट्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। इससे मुंबई महानगरपालिका चुनाव जीतना आसान हो जाएगा।
– बांग्लादेश, कंबोडिया और म्यांमार समेत कई देशों में हिंदुओं पर हमले हुए और मंदिरों को नष्ट किया गया। इन सबके बावजूद भारत की हिंदुत्ववादी सरकार चुप ही रही।
– भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर ९१ पर आ गया। जो लोग कह रहे थे कि ‘भारत दुनिया की तीसरी महाशक्ति बनेगा, वो तो पहले ही बन चुका है’, उन्हें रुपए के गिरने से कोई धक्का नहीं लगा। भाजपा, जिसने कहा था कि रुपया सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं है और रुपए के अवमूल्यन से भारत की प्रतिष्ठा गिरती है, रुपए के ९१ पर गिरने पर भी उनकी आंखों से दो बूंद तक नहीं गिरे।
– जब मोदी ७५ वर्ष के हुए तो लगा कि वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे, लेकिन मोदी अपने पद पर बने रहे।
क्या यह लोकतंत्र है?
हम मानते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक सरकार है, लेकिन वास्तविकता में पिछले गुजरते साल में हमने देखा है कि चार व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षा, द्वेष, क्रोध-लोभ और अहंकार के लिए देश को किस तरह नियंत्रित कर रहे हैं। दलीय हित और राष्ट्रीय हित गौण हो गए हैं और देश के हितों की प्रतिदिन बलि दी जा रही है। राजनीति केवल स्वार्थ, पाखंड और अंतत: हिंसा तक सीमित हो गई है। जब लोग महंगाई और रोजगार की बात करने लगते हैं, तो अयोध्या में धर्म-ध्वज फहराकर ‘हिंदू-मुस्लिम’ जैसे भावनात्मक मुद्दों को उठाया जाता है। नेता, राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय भी अपने कर्तव्य को भूल रहे हैं। हमने २०२५ में भी भारतीय सामाजिक जीवन की त्रासदी देखी है, जब देश का भविष्य या तो उज्ज्वल है या दो या चार व्यक्तियों द्वारा पतन की ओर ले जाया जा रहा है। क्या २०२६ में कुछ अलग होगा?
घटनाएं बवंडर की तरह आती हैं और खत्म हो जाती हैं, लेकिन फायदा क्या? मोदी-शाह का राज और मोदी-शाह व अडानी के लिए जारी ही रहेगा। हमें बस जय श्रीराम का नारा लगाना है बस इतना ही!
