संजय राऊत-कार्यकारी संपादक
महार वतन की जमीन पार्थ पवार की जेब में कैसे गई, इसका खुलासा हो गया है। महाराष्ट्र में कीमती जमीनें अमीरों की जेब में सहज चली जा रही हैं। मेहनतकश किसानों, मजदूरों और आदिवासियों की आधिकारिक जमीनों पर आक्रमण शुरू है। अगर सारी जमीनें ऐसे ही चली गईं तो अपना क्या?
महाराष्ट्र में लाखों की जमीन कौन लूट रहा है? ये जमीनें सिर्फ गौतम अडानी और उनकी कंपनियां ही नहीं लूट रही हैं, बल्कि महाराष्ट्र के राजनेताओं और उनके बेटों ने भी जमीन कब्जाने का धंधा शुरू कर दिया है। उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के चिरंजीव पार्थ पवार ने पुणे के मुंढवा इलाके में ४० एकड़ सरकारी जमीन सिर्फ ३०० करोड़ रुपए में हासिल कर ली। जमीन की मूल कीमत १,८०० करोड़ रुपए। इसके अलावा इस लेन-देन पर मुद्रांक शुल्क भी माफ कर दिया गया। यह मामला उजागर होने के बावजूद भी अजीत पवार मंत्रिमंडल में बने हुए हैं। पुणे के एक भूखंड मामले में जैसे ही हाई कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को फटकार लगाई, शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने जोशी को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था। अब जमाना बदल गया है। अंतुले, निलंगेकर, अशोक चव्हाण जैसे कई लोगों को किसी न किसी कारण से मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। अगर अशोक चव्हाण भाजपा के मुख्यमंत्री होते तो उन्हें आदर्श भूखंड सौदे में मुख्यमंत्री पद से नहीं हटना पड़ता, ये अब सच लगता है। इसलिए मुंढवा के जमीन घोटाले में अजीत पवार पर कार्रवाई होगी, ऐसा नहीं लगता। मुंबई समेत महाराष्ट्र में रणनीतिक जमीनें धनाढ्यों और नेताओं की जेब में जाती रहेंगी और सरकार के आशीर्वाद से सारे लेन-देन सुगमता से होते रहेंगे। आजादी के बाद जमीनों की इतनी लूटपाट कभी नहीं हुई।
महार वतन की जमीन
गौर करनेवाली बात यह है कि पार्थ पवार द्वारा हड़पी गई मुंढवा की जमीन महार वतन की जमीन है। हाडकी हाडवाल यानी महार वतन की जमीन के मुद्दे पर मैं लगातार लिखता रहा हूं। जैसे पक्षियों को खेत से उड़ाया जाता है, वैसे ही दलितों को महार वतन की जमीनों से बेदखल कर दिया गया। उन जमीनों पर आज मालिकाना हक कौन जता रहा है? महाराष्ट्र में, इनाम वर्ग ६ ब के तहत जो जमीनें दलितों के पास थीं, वो गिरवी, आधी किश्त, निश्चित अवधि की खरीद, रिवाज, कुल कायदा, जुल्मशाही जैसे कई कारणों से दलितों के पास से चली गईं। ताकतवर जमींदारों ने उन्हें हड़प लिया। आज उनमें से अधिकांश जमीनों पर चीनी मिलें खड़ी हैं। ये मिल मालिक सत्ताधारी दल में हैं। उन्हें छूने की हिम्मत किसी में नहीं है। जिन उद्योगपतियों ने महार वतन की जमीनें हथिया लीं, उसके बदले में दूसरी जमीन महार वतनदारों को दी जानी चाहिए, ऐसा कुछ तो सरकारी स्तर पर होना चाहिए था। महार वतन की जमीनें दलितों को वापस मिलें, इसके लिए शंकरराव चव्हाण ने मुख्यमंत्री रहते समय एक जीआर (सरकारी आदेश) जारी किया था। नगर जिले के एक जमींदार ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी और जीआर को पुन: कूड़े में डाल दिया गया। फरवरी १९९३ में, नामदेव ढसाल के दलित पैंथर ने महार वतन जमीनों का मुद्दा उठाया था। दलित पैंथर ने इसके लिए मुंबई के कमाठीपुरा में एक सम्मेलन आयोजित किया। यह अज्ञानता, गरीबी और उत्पीड़न के कारण गई हुई दलितों की जमीनों को वापस पाने की लड़ाई थी। महाराष्ट्र के हर जिले में, हर गांव में महार वतन यानी हाडकी हाडवल के नाम से जानी जाने वाली जमीनें हैं। ये जमीनें अंग्रेजों ने महारों को दी थीं। आजादी के बाद ये उनसे छीन ली गईं। महार वतन बिल में सुधार करनेवाला विधेयक डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने १९ मार्च, १९२८ को मुंबई विधिमंडल में पेश किया था। इस विधेयक का उद्देश्य १८७४ के महार वतन अधिनियम में संशोधन करना था। इस अधिनियम के अनुसार, महार वतनदारों को सरकारी काम में गुलामों की तरह दिन-रात काम करना पड़ता था। उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता या उनके परिवार के किसी भी पुरुष को सरकारी काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। इस दौड़-भाग वाले, कठिन और निरंतर चलनेवाले काम के लिए उन्हें ग्रामीणों की ओर से गुजारे के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा और दो आने से लेकर एक रुपए प्रति माह तक का मामूली वेतन मिलता था। डॉ. आंबेडकर इससे सहमत नहीं थे। इसके कारण महार आलसी बन गए थे। उनके जीवन की चेतना नष्ट हो गई थी। उनका स्वाभिमान नष्ट हो गया था। कुछ नया करने की उम्मीद खत्म हो गई थी। वे एक नई गुलामी में उलझ गए थे। गुलामी की इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए ही उन्होंने उस विधेयक में संशोधन करने के लिए विधानमंडल के समक्ष बिल पेश किया था, लेकिन वह पारित नहीं हो सका। फिर स्वतंत्रता के बाद एक ही झटके में महारों से ये जमीनें छीनने का क्रूर काम किया गया। आज वे जमीनें अमीरों, बागान मालिकों और सहकारी उद्योगपतियों की बन गई हैं। मुंढवा क्षेत्र में १,८०० करोड़ रुपए की जमीन मूल महार वतन की है। उस महार भूमि का मूल मालिक कौन है? पार्थ पवार और उनके लोगों ने आसानी से इस जमीन पर कब्जा हासिल कर लिया। पार्थ के पिताजी अजीत पवार होने के कारण ही वे इस महान कार्य को आसानी से अंजाम दे पाए।
मालिक कौन?
जल, जंगल और जमीन के असली मालिक आदिवासी हैं। लेकिन अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले आदिवासियों को उनके ही जंगलों से बेदखल किया जा रहा है। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के जंगलों पर उद्योगपति खुलेआम हमला कर रहे हैं। महाराष्ट्र में सह्याद्रि पर हमले हो रहे हैं। इस संबंध में एक कविता पढ़ने को मिली…
उन्होंने हमारी जमीन चुरा ली
उन्होंने हमारा धन चुरा लिया
उन्होंने हमारी विरासत चुरा ली
उन्होंने हमारी आजादी चुरा ली
उन्होंने हमारी पहचान चुरा ली
उन्होंने सब कुछ चुरा लिया
फिर उन्होंने हमें एक किताब दी
जिसमें लिखा था, ‘चोरी मत करो’
ये पंक्तियां देश में इस समय जो हो रहा है, उस पर एक प्रखर टिप्पणी हैं। गरीबों और शोषितों के पास कुछ भी नहीं बचा है। मराठवाड़ा में आई बाढ़ में सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि किसानों की जमीन भी बह गई। अब वह जमीन कहां मिलेगी? जंगल आदिवासियों का नहीं है। महार वतन की जमीन दलितों की नहीं है। धारावी की जमीन भूमिपुत्रों की नहीं है। मिलों की जमीन पर मिल मजदूरों का अधिकार बहुत पहले ही खत्म हो गया। इतनी जमीनें निगलकर ये धनी क्या करेंगे? जिस जमीन के लिए पूरा महाभारत लड़ा गया, वो जमीन आज भी वहीं पड़ी है, ये भू-माफियाओं को याद रखना चाहिए। पार्थ पवार के जमीन मामले ने ये सारे सवाल फिर से खड़े कर दिए हैं। आज महार वतन की सारी जमीनों पर किसके महल खड़े हैं, ये एक बार आधिकारिक तौर पर जाहिर हो जाना चाहिए। महार वतन की जमीन का सौदा करनेवाले पार्थ पवार अकेले नहीं हैं। महाराष्ट्र के हर जिले में ऐसे कई ठाकुर और गब्बर हैं, जो जमीनों पर कब्जा जमा रहे हैं। अगर सारी जमीनें उनके कब्जे में चली जाएंगी, तो गरीबों के पास बचेगा क्या?
कुआं ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
फिर अपना क्या?
गांव? शहर? देश?
ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता में जो कहा गया है, वो सच है। जमीन पार्थ की है। हमारा सिर्फ महाराष्ट्र है। धारावी अडानी की है, हमारी सिर्फ मुंबई है!
