मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक : अंडमान का मुश्किल मार्ग! ... वीर सावरकर के ढोंगी भक्त!!

रोखठोक : अंडमान का मुश्किल मार्ग! … वीर सावरकर के ढोंगी भक्त!!

संजय राऊत

वीर सावरकर की बेवजह आलोचना करके राहुल गांधी ने बवाल मोल ले लिया। ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का वह एजेंडा नहीं था। भारतीय जनता पार्टी सावरकर के अपमान के खिलाफ सड़क पर उतर आई। इसे सावरकर प्रेम का ढोंग ही कहना होगा। संघ सावरकर का सख्त आलोचक रहा है, परंतु आज राजनीतिक स्वार्थ के लिए भारतीय जनता पार्टी सावरकरवादी हो गई। सावरकर ने १० वर्षों तक अंडमान के कालेपानी में नरक यातना भोगी, जो कि देश के लिए ही थी यह भूलना नहीं चाहिए!

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा से महाराष्ट्र का माहौल गंभीर हो गया है। उस यात्रा में वीर सावरकर पर नाहक टिप्पणी का धब्बा लग गया। अंडमान के जेल में सावरकर ने १० वर्षों से अधिक समय तक नरक यातना भोगी तो देश की आजादी के लिए ही। यह श्री राहुल गांधी को कोई तो समझाकर बताए। सावरकर ने रिहाई के लिए अंग्रेजों के समक्ष माफीनामा लिखकर दिया यह कोई राहुल गांधी के ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का एजेंडा नहीं था और महाराष्ट्र में तो यह एजेंडा होना ही नहीं चाहिए। महाराष्ट्र में आकर श्री राहुल गांधी ने सवाल पूछा, ‘भाजपावाले बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या ऐसे मुद्दों पर क्यों नहीं बोलते हैं?’ श्री गांधी का सवाल योग्य है, परंतु उन्होंने सावरकर की माफी का मुद्दा उठाया और गड़बड़ हो गई। लेकिन दूसरे दिन शेगाव की सार्वजनिक सभा में उन्होंने सावरकर के प्रति मौन साधे रखा यह एक तरह से योग्य ही हुआ। फिर भी उन्हें कहना चाहता हूं कि आप बार-बार लोगों की श्रद्धा को इस तरह से ठेस पहुंचाते हो और भाजपा को विषय परिवर्तन करने का हथियार क्यों देते हो? मैं खुद तीन महीने से ज्यादा समय तक मुंबई के आर्थर रोड जेल में था। इस जेल में भी कई स्वतंत्रता सेनानियों का ठिकाना १९४७ तक था। उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद में एक स्तंभ भी आर्थर रोड जेल में है। एक आम बंदी के रूप में जेल में दिन बिताना मुश्किल होता है। वीर सावरकर ने तो अंडमान में १० साल से अधिक समय बिताया। आय से अधिक संपत्ति के मामले अथवा मनी लॉन्ड्रिंग में झूठा मुकदमा लादकर ब्रिटिशों ने गिरफ्तार नहीं किया था। भारत माता के चरणों से परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए उन्होंने सशस्त्र क्रांति की मशाल जलाई। उसके लिए उन्हें अंडमान के कालेपानी की सजा भुगतनी पड़ी।
ऐसे हुआ सब
दोहरे उम्रवैâद की सजा दिए जाने के कारण २३ दिसंबर, १९६० को अर्थात कारावास के ५० वर्ष पूरे होने पर सावरकर की रिहाई होनी थी। सावरकर के भाई नारायणराव की बिना शर्त तो वीर सावरकर की सशर्त रिहाई हुई। इसे माफी नहीं कह सकते हैं। य.दि. फड़के ने ‘शोध सावरकरांचा’ इस पुस्तक में माफी प्रकरण पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है, जो कि इस तरह से, ‘आपके द्वारा पहले नासिक और बाद में लंदन में की गई सशस्त्र क्रांति के प्रयासों के बदले कारवास में तात्या (सावरकर) ने सोचा-विचारा और इस वजह से सरकार के पास क्षमा-याचना का पत्र भेजा। कुछ लोगों को ऐसी गलतफहमी हो गई है, ऐसा प्रतीत होता है।
वर्ष १९९८ में मुंबई सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता इतिहास के साधनों का दूसरा खंड प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने ३० मार्च, १९२० को अंडमान-निकोबार द्वीप के मुख्य आयुक्त को भेजा गया आवेदन प्रकाशित किया। इस आवेदन में निष्ठापूर्वक सरकार से सहयोग करने की बात कही थी। यह सच्चाई है। लेकिन वो बात शब्दश: सत्य मानने की आवश्यकता नहीं है। तात्या द्वारा समय-समय पर किए गए आवेदन, उसके पीछे उस दौर का राजनीतिक संदर्भ, उसी तरह अंग्रेज शासकों द्वारा उस संदर्भ में व्यक्त की गई प्रतिक्रिया पर गौर किया जाए तो जेल से छूटने के लिए तात्या एक चाल चल रहे थे, ये समझ में आता है। ५० वर्षों तक अंडमान के अंधेरे में घुटन में जीवन यात्रा खत्म करने की बजाय हालात से तालमेल करके सशर्त अथवा बिना शर्त मुक्त होने के लिए वे अंडमान में प्रयास कर रहे थे। इसलिए रिहाई में मददगार ऐसे राजनीतिक हालात निर्माण हुए। ऐसा लगेगा कि सुरक्षा के लिए यह आवेदन कर रहे होंगे इस व्यावहारिक नीति को सफलता मिले। यह सरकार को कई आश्वासन देते हुए और सहयोगियों को लालच दिखाते होंगे। १९३७ तक वे यह खेल, खेल रहे थे। सावरकर और उनके बंधु की अंडमान से रिहाई हो इसके लिए गांधीजी के अनुयायी आग्रही थे। खुद महात्मा गांधी द्वारा ‘यंग इंडिया’ के २६ मई, १९२० के अंक में सावरकर बंधु को रिहा करें, ऐसा आग्रह के साथ प्रतिपादन किया गया। बै. जमनादास मेहता की अध्यक्षता में सावरकर मुक्ति समिति स्थापित की गई थी। १९२३ के कोकोनाड में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में भी सावरकर की रिहाई को लेकर प्रस्ताव मंजूर किया गया। १ व २३ अगस्त, १९२३ को वीर सावरकर ने रिहाई के संदर्भ में आवेदन भेजा था। उस आवेदन में अतीत में किए गए अपने कार्यों के लिए खेद व्यक्त किया गया था। और राजनीति में दोबारा शामिल नहीं होने के बारे में लिखा था, ऐसा प्रथम दर्शनीय प्रतीत होता है। लेकिन ये सावरकर के दांव-पेच होंगे। सरकार द्वारा लादी गर्इं शर्तों का पालन करने के लिए और उनका उल्लंघन करने पर सजा भोगने का लिखित करारनामा सावरकर से लिया जाए, ऐसा उस समय ब्रिटिश सरकार ने तय किया। २७ दिसंबर, १९२३ को सावरकर द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन में कहा, ‘मेरे खिलाफ उचित ढंग से मुकदमा दर्ज किया गया और मुझे दी गई सजा न्याय थी ये मुझे मंजूर है। पिछले जन्म में अपनाए गए हिंसक मार्ग की मैं दिल से निंदा करता हूं। मेरी शक्ति के अनुसार प्रचलित कानून और राज्य के संविधान का पालन करना यह मेरा कर्तव्य है, ऐसा मुझे लगता है। भविष्य काल में मुझे कार्य करने की आजादी दी गई तो नए सुधारों को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक होगा वह करने को मैं तैयार हूं। सरकार मुझे नासिक में रहने दे, ऐसा मेरा निवेदन है।’ अर्थात नासिक में रहने के संबंध में विनती नकार दी गई। नासिक तात्या का गढ़ था। उनके कई मित्र और सहयोगी वहां थे। कई वर्षों के बाद रिहा हुए सावरकर को नासिक में रहने दिया तो वे उन सभी को संगठित करके तात्या फिर पुराना धंधा शुरू कर देंगे, ऐसा डर ब्रिटिश सरकार को लगता था। रत्नागिरी जिले की हद में रहें और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रीति से राजनीति में भाग नहीं लेंगे ये दो शर्तें तात्या द्वारा कबूल किए जाने के कारण उनकी सशर्त रिहाई की जा रही है, ऐसा मॉन्ट गोमेरो ने डॉ. नारायणराव सावरकर को पत्र लिखकर अवगत कराया। उस निर्णय के अनुसार तात्या की रिहाई करने से पहले गुप्तचरों के उपमहानिरीक्षक को किसी तरह पुलिस महानिरीक्षक को सूचित किए जाने की आवश्यकता थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इन दो अधिकारियों द्वारा इस वजह से नाराजगी व्यक्त करना योग्य ही था।
‘भारत रत्न’ क्यों नहीं देते हो?
हिरासत में रहनेवाला कोई भी बंदी अपनी रिहाई के लिए हर तरह का कानूनी प्रयास करता है। १० वर्ष से अधिक समय तक अंडमान में नरक यात्रा ‘देश के लिए’ भोगने पर सावरकर ने ‘दांव-पेच’ के बहाने खेद व्यक्त करके रिहाई का मार्ग चुना होगा तो उसे शरणागति-माफीनामा नहीं कहा जा सकता है। आज ‘ईडी’ जैसे स्वतंत्र हिंदुस्थान की जांच एजेंसियों के डर से अच्छे-अच्छे एक रात में स्वदेशी सरकार की शरण में चले जाते हैं। पार्टी बदल लेते हैं। अपनी निष्ठा को विलीन कर देते हैं। सावरकर ने दशक भर अंडमान में जो यातना सहन की वह राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए राहुल गांधी के ‘भारत जोड़ो’ से जो सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास निर्माण किया उस पर सावरकर के संदर्भ में दिए गए भाषण से पानी फिर गया। प्रधानमंत्री मोदी ने जवाहरलाल नेहरू को निशाना बनाया। तो राहुल गांधी वीर सावरकर को निशाना बना रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम में दोनों का योगदान समान है। सावरकर ने तो तमाम सुखों का त्याग करके आनंद का मार्ग स्वीकार किया। उस पर जेल क्या होती है इसकी कल्पना नहीं होनेवाले लोग सावरकर की रिहाई पर बोलते हैं तो हैरानी होती है। सावरकर के वंशज फिलहाल कहीं नजर नहीं आते हैं। राहुल गांधी ने सावरकर पर बयान दिया कि उनका चेहरा समाचार चैनलों पर दिखाई देता है। ८ वर्षों से भाजपा की सत्ता केंद्र में है लेकिन सावरकर को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करके माफी का कलंक धोकर निकाल दिया जाए, ऐसा ढोंगी सावरकर भक्तों को नहीं लगता। दो महत्वपूर्ण मुद्दे यहां रखता हूं विषय को विराम देता हूं। पत्रकार निखिल वागले ने सोशल मीडिया में एक सत्य कहा। वे कहते हैं, ‘संघ ने जीवनभर हिंदू महासभा और सावरकर का विरोध किया। गोलवलकर ने सावरकर के खिलाफ सख्त टिप्पणी की है। अब राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा और संघ उसका इस्तेमाल कर रहे हैं।’ यह कड़वा सच आज दिखाई देता है। सावरकर के राहुल गांधी कृत अपमान को लेकर महाराष्ट्र में भाजपा, मनसे जैसे लोग सड़क पर उतरे। उनके लिए पत्रकार शकील अख्तर ने एक प्यारा संदेश प्रसारित किया है, ‘अगर भाजपा सावरकर को सबसे बड़ा देशभक्त मानती है तो सबसे ऊंची मूर्ति सरदार पटेल की नहीं उनकी लगती। इंडिया गेट पर भी सुभाषचंद्र बोस की जगह सावरकर की मूर्ति लगती। लेकिन बीजेपी ने भी पटेल, सुभाष बाबू को ही महान देशभक्त माना।’
वीर सावरकर का क्रांतिकार्य महान था लेकिन आज भाजपा को सावरकर के प्रति प्रेम का जो उबाल आया है वह सीधे-सीधे ढोंग है। प्रधानमंत्री मोदी नेहरू के बदनामी की भूमिका छोड़ते नहीं। राहुल गांधी ने सावरकर को उसी वजह से पकड़ा है। यह देश का एजेंडा नहीं है। इस तरह से भारत को वैâसे जोड़ेंगे?

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