मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकपांच राज्यों का आसान परिणाम!.... निश्चित तौर पर कौन जीता?

पांच राज्यों का आसान परिणाम!…. निश्चित तौर पर कौन जीता?

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक। पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा ने ४ राज्य आसानी से जीत लिया। उसमें उत्तर प्रदेश जीतने का उत्सव आज भी मनाया जा रहा है। परंतु सीमावर्ती राज्य पंजाब में भारतीय जनता पार्टी बुरी तरह से पराजित क्यों हुई? इस पर कोई भी बोलने को तैयार नहीं है। ‘आप’ ने दिल्ली से पंजाब तक हाथ-पांव पसार लिया। वे गोवा में घुस गए। ये तस्वीर क्या कहती है?

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चुनावी घमासान अब खत्म हो गया है। पंजाब को छोड़कर शेष चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर सत्ता हासिल कर ली। इस जीत पर उन्हें बधाई देनी ही चाहिए। पांच राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य है। लोकसभा की ८१ सीटें इसी राज्य से चुनी जाती हैं। इस राज्य पर भाजपा ने फिर से अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी ४२ से १२५ पर पहुंच गई और समाजवादी पार्टी के करीब सौ उम्मीदवार २०० से ५०० मतों के अंतर से चुनाव हारे हैं। भाजपा को उत्तर प्रदेश में लोकसभा की १८ सीटें इस वजह से गंवानी पड़ेंगी, ऐसा आज के नतीजों से साफ हो गया है। प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में मोदी, शाह से ज्यादा मेहनत की, लेकिन वे सीटें नहीं जीत सकीं। हालांकि कांग्रेस १५ सीटें भी जीत लेती है तो काफी होगा, ऐसा शुरू से ही कहा गया था। प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में थोड़ा पहले उतरना चाहिए था। वे बहुत देर से आर्इं, लेकिन आज वे जो प्रयास कर रही हैं, उसका लाभ उन्हें वर्ष २०२४ में मिलेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली की विजय सभा में जोरदार भाषण दिया। इन परिणामों ने २०२४ में जीत का मार्ग प्रशस्त किया, ऐसा उन्होंने कहा। यह उनका मत है। २०२४ तक पुल के नीचे से काफी पानी बह चुका होगा। राजनीति में कल क्या होगा, जहां इसकी भविष्यवाणी करना संभव नहीं है वहां २०२४ मतलब बहुत दूर की बात है। गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर में कोई लड़ाई थी ही नहीं। इसलिए कौन सी लड़ाई जीतने का दंभ आज दिखाया जा रहा है? भाजपा के लिए असली लड़ाई सिर्फ पंजाब में थी। लेकिन भाजपा उस मैदान से भाग गई व कुल मिलाकर किसी तरह दो सीटों पर जीत हासिल की। भाजपा ने पंजाब में जीत का झंडा फहराया होता तो उस विजय का उत्सव सही होता, परंतु सिख समुदाय ने पंजाब की धरती पर अहंकार को परास्त कर दिया। भाजपा के पास पंजाब में गंवाने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन कांग्रेस ने पंजाब को हमेशा के लिए खो दिया है। पंजाब से अकाली दल का भी अस्त हो गया और लोगों ने बादल परिवार की राजनीति को खत्म कर दिया। खुद प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर बादल हार गए। पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी और कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार रहे प्रदेश अध्यक्ष नवज्योत सिंह सिद्धू चुनाव हार गए। ये तस्वीर क्या कहती है? हिंदुस्थान के कल की राजनीति की जो तस्वीर इन पांच राज्यों से उभर कर आई है उसके बारे में हम सभी को सोचना चाहिए।
जो है वो बचा लिया!
भारतीय जनता पार्टी चार राज्यों में जीत का जश्न मना रही है, लेकिन उन्होंने उनके पास जो है सिर्फ उसी को बचाया है। नया क्या हासिल किया? उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में उनकी सत्ता थी, उन्होंने इसे बचा लिया। पंजाब में उनकी दयनीय पराजय हुई और वे किसी तरह दो सीटें जीत सके। इधर, केजरीवाल और ‘आप’ के सामने श्री नरेंद्र मोदी और शाह नहीं टिक सके। पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने खुद ही खुद को हरा दिया। सिद्धू जैसे अस्थिर दिमाग वाले को पार्टी की बागडोर सौंपकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हरीश रावत हार गए। उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हार गए। जीते हुए राज्य का सेनापति ही हार जाता है, ये वैसा ही हुआ। अब से पहले उत्तराखंड में भाजपा के खिलाफ नाराजगी थी, लेकिन हरीश रावत नामक वृद्ध नेता की जिद के कारण बहुत कुछ गंवाना पड़ा। अब भविष्य में पुराने नेताओं के चंगुल से कांग्रेस को छुड़ाने की बड़ी चुनौती गांधी भाई-बहन के समक्ष होगी। पांच राज्यों में हार के बाद कांग्रेस में जो पुराने लोगों का समूह है ‘जी-२३’, फिर उफान मारेगा। कांग्रेस का अच्छा न हो, ऐसा चाहनेवाले लोग कांग्रेस में ही हैं। कांग्रेस को बर्खास्त करने का प्रस्ताव गांधी जी ने १९४७ में रखा था। उसे अमल में लाने की जिम्मेदारी इन ‘जी-२३’ वालों ने ली है, ऐसा लगता है। पंजाब, भाजपा के पास नहीं था, लेकिन जिस कांग्रेस के पास यह था उन्होंने उसे गवां दिया। देश के सीमावर्ती राज्य पर ‘आप’ जैसी पार्टी का बहुमत हासिल करना, राष्ट्रीय पार्टियों की पराजय है। यह बेहद संवेदनशील राज्य है। केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली पर ‘शासन’ करना व पंजाब का सूबा संभालने में अंतर है। दूसरा यानी खुद केजरीवाल अधूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं। उनके पास गृह, वित्त जैसे विभाग ही नहीं हैं। इसके विपरीत पंजाब के मुख्यमंत्री का मान बड़ा होगा। उनके हाथ में अपना पुलिस बल होगा। इसका दुरुपयोग दिल्ली की राजनीति में न हो, बस इतना ही।
डॉ. नड्डा का यश
भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी ही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों की जीत का श्रेय भाजपा अध्यक्ष श्री जे. पी. नड्डा को दिया जा रहा है। श्री अमित शाह व योगी आदित्यनाथ के बीच संबंध अच्छे नहीं हैं, ऐसी खबरें बीच-बीच में उठती रहती हैं, जो कि उतनी सही नहीं होंगी। क्योंकि श्री शाह ने उत्तर प्रदेश में योगी की जीत के लिए रैलियां और रोड शो किए। समाजवादी पार्टी पर सबसे ज्यादा हमला शाह ने ही किया, लेकिन आजम खान सहित अन्य सभी विवादित लोग फिर भी जीत गए।
विपरीत हवा
उत्तर प्रदेश में हवाएं भाजपा के खिलाफ चल रही थीं। फिर भी भाजपा को वोट मिला। क्योंकि मतदाता नरेंद्र मोदी को देश के नेता के रूप में देखता है और उनके समकक्ष नेता आज लोगों के सामने नहीं है। मोदी चुनावों को एक उत्सव के रूप में देखते हैं और इस उत्सव में लोगों को शामिल कर लेते हैं। इसके बाद त्योहार में शामिल होने वाले लोग चुनाव भर के लिए बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था इन तमाम समस्याओं को भूल जाते हैं।
मोदी की ही तरह श्री अरविंद केजरीवाल दूसरे उत्सव वीर हैं। वे अपनी और पार्टी की जमकर मार्वेâटिंग करते हैं। कल तक नास्तिक रहे केजरीवाल चुनाव से पहले हनुमान मंदिर जाकर पूजा करते हैं और अपने हनुमान भक्त होने का प्रचार करते हैं। केजरीवाल ने अपने दिल्ली राज्य में अच्छा काम किया है। बिजली से लेकर पानी तक, स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक सब कुछ मुफ्त दिया गया। यही मुफ्तखोरी वाला आश्वासन उन्होंने पंजाब की जनता को दिया था, परंतु पंजाब में सबसे बड़ी समस्या अंतत: किसान और कानून-व्यवस्था की होगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान इससे वैâसे निपटेंगे? पंजाब में कांग्रेस अब कमजोर हो गई है तथा अकाली दल नगण्य साबित हुआ है। संवेदनशील सीमावर्ती राज्य की यह तस्वीर अच्छी नहीं है।
विरोधी नहीं चाहिए!
संसदीय लोकतंत्र से राजनीतिक विरोधियों को खत्म करना देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। देश की राजनीति से विपक्ष को साम, दाम, दंड, भेद के जरिए खत्म करना और इसके लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करना अब भाजपा का एक सूत्री कार्यक्रम बन गया है। १० मार्च के बाद महाराष्ट्र सरकार को गिरा देंगे, ऐसी घोषणा श्री देवेंद्र फडणवीस करते हैं और चंद्रकांत पाटील उनके सुर में सुर मिलाते हैं।
प. बंगाल और महाराष्ट्र के राज्यपाल मनमाना बर्ताव करते हैं। फिर चुनाव और बहुमत का क्या मतलब है? पंजाब में ‘आप’ ने जीत हासिल की है। गोवा में वे दाखिल हो गए हैं। दिल्ली से उन्हें हटाना मुश्किल है।
प. बंगाल में ममता और महाराष्ट्र में महाविकास आगे रहेगी ही। देश के २९ राज्यों में से सिर्फ १० राज्यों की विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है। सिक्किम, मिजोरम और तमिलनाडु में तो भाजपा का अस्तित्व ही नहीं है। आंध्र, केरल, पंजाब, बंगाल, तेलंगाना, दिल्ली, ओडिशा और नगालैंड में भाजपा नाममात्र के लिए है। क्योंकि इन राज्यों में मतदाता ‘हिजाब’ जैसे मुद्दों को अहमियत नहीं देते हैं। गोवा में भाजपा को २० सीटें ही मिलीं वो भी औरों की वजह से हुए मतों के विभाजन के कारण। पणजी में बाबूश मोन्सेरात और उनकी पत्नी जेनिफर ने जीत हासिल की। ये बाबूश महाशय जीतने के बाद कहते हैं कि ‘हमारी जीत में भाजपा का कोई योगदान नहीं है। हम अपने बल पर जीते हैं।’ मुंबई में गोवा की जीत का जश्न मनाने वालों को बाबूश महाशय की बातों को ध्यान में रखना चाहिए। गोवा जैसे राज्य में कोई भी जीते परंतु वह जीत सच्ची नहीं होती। राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता है। चाहे फिर वह उत्तर प्रदेश हो, अन्यथा महाराष्ट्र। राष्ट्रीय नेता के रूप में श्री नरेंद्र मोदी का आज कोई विकल्प नहीं है। लेकिन अंतत: उस विकल्प को लोग तैयार करेंगे और अहंकार मिट्टी में मिल जाएगा! चार राज्यों के नतीजों ने अहंकार का स्तर ऊंचा उठ गया है। कम हो जाए तो भी काफी है!

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