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समीर अंजान का संदेश: चलो चलें गांव की ओर

हिमांशु राज

देश के प्रसिद्ध गीतकार समीर अंजान ने हाल ही में देश में उत्पन्न एलपीजी गैस संकट के संदर्भ में एक गहन संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि हमें अपने आप को गाँव से जोड़कर रखना चाहिए। उनका तात्पर्य केवल टहलने-फिरने से नहीं, बल्कि दिल और दिमाग में एक आदर्श गाँव बसाने से है—जहाँ हरियाली हो, खेत हों, फसलें लहलहाती हों, पालतू जानवर चरते हों, कुएँ, नहर, हैंडपंप और तालाब हों, मिट्टी की सुगंध हो, रस्सी वाली खाटें हों और गोबर का लेपन हो। यहाँ प्रकृति और समाज का वास्तविक संतुलन स्थापित हो सकता है।

आज दुनिया वैश्वीकरण के दौर में खड़ी है, जहाँ किसी एक छोर पर गैस, पेट्रोल, डीज़ल या अन्य संसाधनों की कमी का प्रभाव दूसरे छोर तक तुरंत पहुँच जाता है। ऐसे में समीर अंजान का यह संदेश न केवल प्रासंगिक है, बल्कि जीवन-दर्शन का सार भी समेटे हुए है।

गाँव की इस जीवनशैली को अपनाने का अर्थ है आधुनिक संकटों से सहज रूप से निपटना। कल्पना कीजिए, शहर की चकाचौंध में रहते हुए भी हम अपने भीतर गाँव की अंगीठी (चूल्हे) की गर्माहट महसूस करें। लकड़ी का धुआँ और भुनी हुई रोटी की महक न केवल आत्मनिर्भरता सिखाती है, बल्कि एलपीजी जैसी बाहरी निर्भरता से मुक्ति का मार्ग भी दिखाती है।

बैलों की घट्टी (जुआ) पारंपरिक खेती का प्रतीक है, जो हमें सिखाती है कि मशीनों पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना प्राकृतिक शक्ति का उपयोग कैसे किया जा सकता है। खेतों में बैलों से हल चलाना आज भी कई गाँवों में प्रचलित है, जो यह याद दिलाता है कि असली ताकत प्रकृति में ही निहित है।

गाय का दूध—शुद्ध और पौष्टिक—आज के पैकेट वाले दूध की तुलना में कहीं बेहतर माना जाता है। इसे अपनाकर हम न केवल स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि पशुपालन की स्वावलंबी परंपरा को भी जीवित रख सकते हैं।

इस प्रवृत्ति को विकसित करने से शहरी जीवन भी सरल बन सकता है। कल्पना करें कि बिजली और पानी की किल्लत के समय हम वर्षा जल संचयन अपनाएँ, जैसे गाँवों में तालाबों का उपयोग होता है। प्लास्टिक की जगह मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें और गोबर से खाद बनाकर पर्यावरण को सुरक्षित रखें।

व्यस्त जीवन के बीच गाँव की खाट पर लेटकर सूर्यास्त देखने की आदत हमें मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति दे सकती है। वैश्विक संकटों के बीच भी हमारा मन हरे-भरे खेतों और प्रकृति से जुड़ा रहेगा। समीर अंजान जैसे कलाकार अपने गीतों के माध्यम से यही संदेश देते हैं, जो सुनते ही गाँव की मिट्टी की सोंधी सुगंध का एहसास कराते हैं।

गाँव की जड़ों को मजबूत करके हम न केवल संकटों का सामना कर सकते हैं, बल्कि जीवन को अधिक सार्थक बना सकते हैं। शहरों में रहते हुए भी गाँव की जीवनशैली को अपनाकर हम स्वावलंबी, संतुलित और सुखी जीवन जी सकते हैं। यही जीवनशैली भविष्य की कुंजी है।

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