मुख्यपृष्ठग्लैमर‘संगीत नहीं, विज्ञापन में जाना चाहते थे शान’—पिता के 14 साल के...

‘संगीत नहीं, विज्ञापन में जाना चाहते थे शान’—पिता के 14 साल के संघर्ष ने सिखाया सबक

हिमांशु राज

क्या आप जानते हैं कि भारत के सबसे प्रिय पार्श्व गायकों में शुमार शान ने कभी संगीत को पेशे के रूप में अपनाने की सोची ही नहीं थी? हाल ही में आदित्य भट्ट के साथ दिए एक साक्षात्कार में शान ने अपने जीवन के इस अनछुए पहलू को साझा किया। उन्होंने कहा, “संगीत मुझे सहज ही आता था, लेकिन मैं इसे व्यवसाय बनाना नहीं चाहता था। मैं कुछ अधिक व्यावहारिक बनना चाहता था।” शान का जन्म एक संगीतमय परिवार में हुआ था। उनके पिता, स्वर्गीय मानस मुखर्जी, ने मुंबई में 1966 से संघर्ष शुरू किया था। 14 लंबे साल बीतने के बाद 1980 में उनका पहला फिल्मी गीत रिलीज हुआ।

“पिता जी का यह संघर्ष देखकर मैं सतर्क हो गया था,” शान ने बताया। इसलिए उन्होंने तय किया कि पढ़ाई पूरी कर कोई छोटा-मोटा काम ढूंढेंगे, ताकि कम से कम जेब तो भर जाए—रसोई चलाने की चिंता बाद में। उनका प्लान बी कुछ रचनात्मक था—विज्ञापन की दुनिया। “मैं विज्ञापनों में जाना चाहता था, यही वजह है कि जिंगल्स गाना मुझे रोमांचित करता था,” उन्होंने खुलासा किया। विडंबना देखिए, यही जिंगल्स और शुरुआती संगीतिक अवसरों ने उन्हें उसी राह पर ला दिया, जिससे वे बचना चाहते थे। आज शान ‘बेखयाली’, ‘छोटे छोटे शहरों से’ और ‘दिल ने यह कहा है’ जैसे सुपरहिट गीतों के लिए मशहूर हैं।

बॉलीवुड से लेकर विज्ञापन जिंगल्स तक, उनकी मधुर आवाज ने लाखों दिल जीत लिए हैं। यह किस्सा भारतीय संगीत उद्योग की कठिनाइयों को भी उजागर करता है, जहां प्रतिभा के बावजूद स्थिरता मिलना दुर्लभ है। शान का सफर साबित करता है कि भाग्य और मेहनत मिलकर रास्ते बदल देते हैं। युवा कलाकारों के लिए यह प्रेरणा है कि वे कभी हार न मानें।

अन्य समाचार