सुनिल रावत
महाराष्ट्र के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक चौंकानेवाला खुलासा सामने आया है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार की संस्था द्वारा सर्वेक्षण किए जाने के बावजूद, राज्य के २३,००० से अधिक वेटलैंड्स (जलक्षेत्रों) को कानूनी सुरक्षा देने की प्रक्रिया प्रशासनिक लालफीताशाही में फंसी हुई है। इस देरी के कारण पर्यावरण प्रेमियों ने राज्य के महत्वपूर्ण इकोसिस्टम के नष्ट होने का डर जताया है।
कार्रवाई क्यों नहीं?
केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली संस्था ‘नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट’ ने पिछले दो वर्षों में महाराष्ट्र के वेटलैंड्स का जमीनी सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण पूरा कर लिया है। इससे पहले, इसरो के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर ने भी सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए ‘नेशनल वेटलैंड एटलस’ तैयार किया था। इतनी सटीक वैज्ञानिक जानकारी और डेटा उपलब्ध होने के बाद भी इन क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर ‘संरक्षित जलक्षेत्र’ घोषित करने की प्रक्रिया रुकी हुई है।
प्रमुख मुद्दे और चिंताएं
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि वेटलैंड्स के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। ‘नैटकनेक्ट’ के निदेशक बी.एन. कुमार के अनुसार, वैज्ञानिक आंकड़े मौजूद होने के बावजूद निर्णय लेने में देरी यह दर्शाती है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।
विकास का दबाव और अतिक्रमण: ‘सागरशक्ति’ के निदेशक नंदकुमार पवार चेतावनी देते हैं कि शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के दबाव में इन वेटलैंड्स पर भू-माफियाओं की नजर है। कई जगहों पर वेटलैंड्स में मिट्टी डालकर अवैध रूप से जमीन कब्जाने का काम धड़ल्ले से चल रहा है।
बाढ़ का खतरा: पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि उरण जैसे क्षेत्रों में बार-बार आनेवाली बाढ़ का मुख्य कारण इन वेटलैंड्स का विनाश है। प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बंद होने से जनजीवन पर संकट मंडरा रहा है। राज्य के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के अनुसार, एनसीएससीएम की रिपोर्ट अब जिला प्रशासन को सत्यापन के लिए भेजी जाएगी। जिला कलेक्टर के स्तर पर जांच के बाद इन वेटलैंड्स की सूची पर आम जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी।
‘यह प्रक्रिया लंबी और थकाऊ है। डर है कि जब तक प्रशासन कागजी कार्रवाई पूरी करेगा, तब तक विकास और अतिक्रमण के कारण इनमें से कई वेटलैंड्स नक्शे से ही मिट चुके होंगे।’
-हेमंत शर्मा, सहायक जनहित अभियान
‘वेटलैंड्स केवल पानी के स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये जैव विविधता को बनाए रखने और बाढ़ को रोकने के लिए ‘प्राकृतिक स्पंज’ का काम करते हैं। यदि महाराष्ट्र सरकार ने जल्द ही इन २३,००० वेटलैंड्स को कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं की तो राज्य को गंभीर पर्यावरणीय नुकसान झेलना पड़ सकता है।’
– बी एन कुमार निदेशक, नेट कनेक्ट
