सूरज सिंह
मुंबई महानगरपालिका की लापरवाही के चलते गरीब और जरूरतमंद मरीजों की हालत बदतर होती जा रही है। महापौर निधि, जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवनरेखा मानी जाती है, वह पिछले चार वर्षों से लगभग ठप पड़ी है। प्रशासकीय काल के दौरान आए ८६९ आवेदनों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। नए महापौर के पदभार संभालने के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा है। कुल ९१० आवेदन महापौर कार्यालय में लंबित पड़े हैं, जिससे साफ है कि प्रशासन मरीजों की पीड़ा के प्रति पूरी तरह उदासीन बना हुआ है।
किडनी, वैंâसर, हृदय और यकृत जैसे गंभीर रोगों के इलाज के लिए महापौर निधि से दी जानेवाली सहायता मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। डायलिसिस के लिए १५ हजार रुपए और बड़े ऑपरेशन के लिए २५ हजार रुपए तक की मदद तय है, लेकिन फाइलों में दबे इन आवेदनों के कारण मरीजों को समय पर सहायता नहीं मिल पा रही है।
निधि मौजूद, फिर भी मदद नहीं
महापौर निधि में करीब ४१ लाख रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को सहायता नहीं मिल रही है, जो प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
अपीलें भी बेअसर
महापौर द्वारा भेंट वस्तुओं के बजाय निधि में योगदान देने की अपील के बाद कुछ राशि जमा जरूर हुई है, लेकिन इसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा है। स्पष्ट है कि महापौर निधि, जिसका उद्देश्य गरीब मरीजों को त्वरित सहायता देना है, वह अब केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। मरीज परेशान हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और तंत्र पूरी तरह बेखबर नजर आ रहा है।
नए महापौर के बाद भी हालात जस के तस
नए महापौर के आने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। एक महीने में ४१ नए आवेदन और जुड़ गए, जिससे लंबित आवेदनों का बोझ और बढ़ गया है।
आयुक्त और प्रशासन की निष्क्रियता
७ मार्च २०२२ को नगरसेवकों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से प्रशासकीय काल लागू हुआ, जिसमें महापौर के अधिकार प्रशासक और आयुक्त के पास थे। इसके बावजूद इन अधिकारियों ने महापौर निधि के आवेदनों पर कोई ध्यान नहीं दिया। न तो फाइलों पर विचार हुआ और न ही मंजूरी दी गई, जिससे सैकड़ों मरीज मदद से वंचित रह गए।
