संजय राऊत
`शास्त्री भवन के ऐतिहासिक पुस्तकालय में १० लाख किताबें हैं। मोदी के `सेंट्रल विस्टा’ प्रोजेक्ट के लिए शास्त्री भवन ढहा दिया जाएगा, लेकिन १० लाख किताबें रखने के लिए देश की राजधानी में जगह नहीं है। `किताबें और इतिहास मिटाओ’, यह हर लोकतंत्र-विरोधी शासक का रवैया होता है। उसी के तहत भारत में ज्ञान का विनाश जारी है…’
देश में मोदी-शाह वगैरह का शासन आने के बाद से देश का सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर गिरता जा रहा है। मुगलों के आक्रमण से भारत की उच्च सांस्कृतिक परंपरा नष्ट हुई थी, कुछ वैसा ही पिछले दस सालों में हुआ है। इतिहास, किताबों और ग्रंथों को लेकर फिलहाल सरकार गंभीर नहीं है। हुकूमत करने का मतलब इतिहास और किताबें नष्ट करना नहीं होता। हमारे पूर्वजों ने जो भव्य सांस्कृतिक संस्थान तैयार किए, उन इमारतों पर अपने गुट का कब्जा जमाना ही शासन नहीं कहलाता। किसी देश का सांस्कृतिक क्षेत्र जब धर्मांध और राजनीति से ग्रस्त हो जाता है, तब उस देश के भविष्य को लकवा मार जाता है। फिलहाल, हमारा देश उसी राह पर निकल पड़ा है। नया मामला यह है कि `सेंट्रल विस्टा’, जो मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है, उसके लिए ऐतिहासिक शास्त्री भवन पर बुलडोजर चलाया जाएगा। हथौड़े चलाने की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। शास्त्री भवन में १३५ साल पुरानी `सेंट्रल सेक्रेटरीएट लाइब्रेरी’ है। उस लाइब्रेरी को वहां से हटाया जा रहा है, जैसे किसी कत्ल किए गए शव को हटाया जाता है, ठीक उसी तरह। इस पुस्तकालय में तकरीबन दस लाख किताबें, कई ऐतिहासिक दस्तावेज और दुर्लभ ग्रंथ हैं। वे ग्रंथ बाहर निकाले जा रहे हैं। सालों-साल से यह पुस्तकालय शास्त्री भवन में चल रहा है, लेकिन मोदी की नई व्यवस्था में इस ऐतिहासिक पुस्तकालय के लिए जगह मयस्सर नहीं है। फिलहाल, इन किताबों के लिए मोदी ने एक सरकारी इमारत में दो छोटे कमरे दिए हैं। दस लाख किताबें और दस्तावेज वगैरह सिर्फ दो कमरों में कैसे समाएंगे? यानी एक भव्य ऐतिहासिक पुस्तकालय पर मोदी सरकार ने बुलडोजर चला दिया है। यह पुस्तकालय कई सरकारी अफसरों और केंद्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के लिए एक बड़ी `धरोहर’ साबित हुआ था।
सुनहरा दौर खत्म
भारत का सांस्कृतिक सुनहरा दौर खत्म हो चुका है। भारत के पुराने हुक्मरान किताबों की दुनिया में बसर करते थे। गांधी और नेहरू ने खुद कई किताबें लिखीं। उनके लेखन को जागतिक मकबूलियत मिली। नरेंद्र मोदी की नजर में दीनदयाल उपाध्याय से बड़ा लेखक भारत में कोई नहीं है। पूरी भाजपा की यही राय है। एक तो मौजूदा सरकार की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वैचारिक समझ बेहद संकुचित है। उन्हें लगता है कि २०१४ के बाद ही भारत आजाद हुआ है। इसीलिए १८९१ में कायम की गई शास्त्री भवन की इस लाइब्रेरी को उनकी मंजूरी हासिल नहीं है।
फिर, इस लाइब्रेरी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर रोशनी डालने वाले कई ग्रंथ और ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। इतिहास के इन पन्नों पर भाजपा का कहीं कोई जिक्र नहीं है। इसीलिए ऐसी लाइब्रेरियां भाजपा को बेचैन कर रही हैं।
उनकी नजर में वह ५,५०० वर्ग मीटर का महज एक भूखंड है। भूखंड पर किताबें रखने से जमीन की कीमत क्या रह जाएगी? इसीलिए शास्त्री भवन की लाइब्रेरी को खत्म किया जा रहा है। बेशक, हुक्मरान खत्म हो जाते हैं, लेकिन किताबें अमर हैं, यही हकीकत है। ज्ञान का दायरा छपी हुई किताबें ही बढ़ाती हैं। किताबें खरीदना और उन्हें सहेजना एक महान शौक है। यह मेहनत का काम है। ऑक्सफोर्ड और वैंâब्रिज के पुस्तकालय महान हैं। वहां के छात्र और पारखी पाठक भी महान हैं। रोजर बेकन ऑक्सफोर्ड का एक होनहार छात्र था। उस दौर में बारूद तैयार करने की तरकीब उसे मालूम थी। खगोलशास्त्र पर उसने सैकड़ों किताबें जमा की थीं। अपने पसंदीदा विषय के अध्ययन के लिए उसने उस जमाने में पांच हजार पाउंड की कीमत की किताबें जुटाई थीं। बेकन ने जादू-टोने पर किताबें जुटाकर उस पर भी अध्ययन किया। इसलिए विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में दूसरे लोग उससे दूर ही रहते थे। बहस-मुबाहसे होते थे। मानव विकास के सिद्धांत (डार्विन) का विरोध करने वाले विद्वान वहां के पुस्तकालय में मौजूद थे। (फिलहाल ऐसे लोग भारत में हैं।)
इस सिद्धांत पर एक बार इस कदर तीखी बहस हुई कि ऑक्सफोर्ड के विशप ने थॉमस हक्सले को निशाना बनाते हुए कहा कि हक्सले के दादा वगैरह बंदर रहे होंगे। तब हक्सले ने कहा, `मेरे दादा बंदर रहे हों तो भी मुझे शर्मिंदगी नहीं होगी; लेकिन इतिहास, विज्ञान और सच को छुपाने वालों से ताल्लुक रखना कहीं ज्यादा शर्मनाक होगा।’ यह सुनकर पुस्तकालय में मौजूद एक महिला गश खाकर गिर पड़ी। आज भी और दूसरा क्या चल रहा है? सच और इतिहास को छुपाया जा रहा है और उसके लिए पुस्तकालयों को तबाह किया जा रहा है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में कहा जाता था कि किताबें और पुस्तकालय अमर हैं। इस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आने वाले छात्रों को यह नसीहत दी जाती थी कि `खुद को अमर समझकर पढ़ाई करो और कल ही मर जाने वाले हो, यह मानकर जियो।’ उसमें आज भी किसी बदलाव की जरूरत नहीं है।
संस्थानों पर कब्जा
मुंबई के मशहूर एशियाटिक पुस्तकालय पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया है। उसके बाद उस पुस्तकालय का गृह मंत्री अमित शाह ने दौरा किया। इसी पुस्तकालय में कभी दुर्गा भागवत की आवाजाही हुआ करती थी। शाह का जिक्र भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और संस्कृति के विरोधी के तौर पर ही होता है।
मुंबई मराठी ग्रंथ संग्रहालय की इमारत पर इन लोगों की नजर है। साहित्यिक संस्थाओं, साहित्य परिषदों, राष्ट्रीय पुस्तक मेलों, नेशनल बुक ट्रस्ट, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसे क्षेत्रों में पुरस्कार देने वाली समितियों पर भाजपा ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। पुणे में महाराष्ट्र साहित्य परिषद के चुनाव में क्या खेल हुआ, वह सबके सामने है। सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को तबाह करना मौजूदा हुक्मरानों का एजेंडा है। दुनिया के इतिहास में कई तानाशाहों और सम्राटों ने यही किया। पुस्तकालयों और इतिहास को मिटाने की वारदातें चीन, बगदाद, जर्मनी, जाफना और स्पेन में हुर्इं। बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को फूंका और उसके पुस्तकालय में आग लगाई, तो वह तीन महीने तक जलता रहा। बगदाद पर हमले के दौरान मंगोल सेनापति हलाकू खान ने वहां के तमाम पुस्तकालय तबाह कर दिए। टाइग्रिस नदी में किताबें फेंकी गर्इं, तो वह नदी स्याही से काली हो गई। नाजी जर्मनी में १९३३ में उदारवादी लेखकों की लाखों किताबें सरेआम जलाई गर्इं। तानाशाहों को लगता है कि पुस्तकालयों को नष्ट कर देने से विचार और इतिहास पस्त हो जाते हैं। हकीकत में ऐसा कभी नहीं होता। जो जलता है, वह सिर्फ कागज होता है; विचार हमेशा कायम रहता है। नई हुकूमत पुराना इतिहास मिटा देती है, ज्ञान को नष्ट करती है और राजनीतिक जंग में सांस्कृतिक रहनुमाओं को भी दरकिनार कर देती है। किताबें जलाना, किताबों को मुनासिब जगह न देना, किताबों को छुपाकर रखना, यह सिर्फ कागज मिटाना नहीं है। यह स्मृतियों, बहसों और सच को मिटाने की साजिश होती है। यह ज्ञान का विनाश होता है।
भारत में फिलहाल ज्ञान का विनाश जारी है!
लेकिन ज्ञान का दिया कभी-कभार मद्धम जरूर पड़ता है, बुझता तो कभी नहीं।
