कविता श्रीवास्तव
डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन लेन-देन के बढ़ते चलन ने जहां आम लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराधियों के लिए नए अवसर भी पैदा कर दिए हैं। खासतौर पर बुजुर्ग नागरिक इन अपराधियों का आसान निशाना बनते जा रहे हैं। देश के कई शहरों में ऑनलाइन ट्रांजैक्शन, बैंकिंग धोखाधड़ी, एटीएम कार्ड के दुरुपयोग और फर्जी कॉल के जरिए वरिष्ठ नागरिकों की जीवनभर की कमाई लूटने की घटनाएं हो रही हैं। इस आर्थिक नुकसान से बुजुर्गों का आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन भी प्रभावित होत रहा है। साइबर ठग बेहद चालाकी से बैंक अधिकारी बनकर फोन करते हैं। केवाईसी अपडेट कराने के नाम पर जानकारी मांगते हैं, या फिर किसी इनाम, लॉटरी और बीमा योजना का लालच देकर लोगों से ओटीपी, एटीएम पिन या बैंक खाते की जानकारी हासिल कर लेते हैं। कई बार एटीएम मशीनों के पास भी अपराधी सक्रिय रहते हैं और मदद के बहाने कार्ड बदलकर पैसे निकाल लेते हैं। डिजिटल तकनीक से कम परिचित बुजुर्ग इनकी ठगी का शिकार हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल पुलिस या साइबर सेल की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र को अधिक सतर्क और सक्रिय होने की आवश्यकता है। बैंकों को अपने वरिष्ठ नागरिक ग्राहकों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने चाहिए। बड़े लेन-देन पर दोहरी पुष्टि, संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर तुरंत अर्लट और वरिष्ठ नागरिकों के खातों के लिए विशेष निगरानी प्रणाली विकसित होनी चाहिए। बैंकों में बुजुर्गों को साइबर सुरक्षा के बारे जानकारी देनी चाहिए। कई जगहों पर एटीएम केंद्रों में सुरक्षा गार्ड नहीं होते या निगरानी वैâमरे ठीक से काम नहीं करते। इससे अपराधियों के लिए आसानी हो जाती है। जरुरी है कि सभी एटीएम केंद्रों पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो और संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई की जाए। सरकारी एजेंसियों और सामाजिक संगठनों की भूमिका इसमें बेहद अहम है। समय-समय पर जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को साइबर अपराधों के तरीकों और उनसे बचने के उपायों के बारे में बताया जाना चाहिए। खासकर बुजुर्गों के लिए सामुदायिक स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करके उन्हें मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान और साइबर सुरक्षा की बुनियादी जानकारी देनी चाहिए। परिवारों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। आज की व्यस्त जीवनशैली में कई बार बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं और तकनीकी मामलों में दूसरों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे समय-समय पर घर के बुजुर्गों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में समझाएं और उनके बैंकिंग कार्यों में सहयोग करें। बुजुर्गों के साथ हो रही आर्थिक ठगी केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा प्रश्न भी है। यदि बैंक, प्रशासन, समाज और परिवार मिलकर सुरक्षा तंत्र को मजबूत करें और जागरूकता बढ़ाएं, तो इन घटनाओं पर लगाम संभव है। वरिष्ठ नागरिकों की जीवन भर की कमाई की रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
