तौसीफ कुरैशी
दोस्तों अगर आपको लगता है कि हॉर्मुज का संकट सिर्फ तेल और गैस तक सीमित है तो तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। लगभग २३ किलोमीटर चौड़ा यह जल डमरू मध्य केवल ऊर्जा ही नहीं, बल्कि खाद, केमिकल्स, अनाज और मशीनरी के वैश्विक व्यापार की भी अहम जीवनरेखा है। हाल की खबरों के मुताबिक, ईरान ने वहां समुद्री माइंस बिछा दी हैं कुछ दिखाई देती हैं, कुछ समुद्र की गहराई में छिपी हैं। ऐसे हालात में जहाजों का गुजरना जोखिम भरा हो गया है और बीमा कंपनियां भी हाथ खींच रही हैं। नतीजा यह है कि खाद के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें ४७० डॉलर प्रति टन से बढ़कर ५८४ डॉलर तक पहुंच गई हैं। भारत अपनी खाद की करीब ४० प्रतिशत आपूर्ति मध्य-पूर्व से मंगवाता है। ऐसे में अगर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई तो सबसे बड़ा झटका किसानों को लगेगा खासकर रबी की फसल के समय, जब गेहूं की बुवाई के लिए खाद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। मान लीजिए युद्ध तुरंत थम भी जाए, तब भी समुद्र में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाने में महीनों लग सकते हैं। इसका सीधा असर खेतों और हमारी थाली पर पड़ेगा। यह संकट याद दिलाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि खेत और किसान की मजबूती से भी तय होती है। आत्मनिर्भर खाद उत्पादन और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर गंभीरता से सोचने का यही समय है। किसान बचेगा, तभी राष्ट्र मजबूत रहेगा।
‘डेटा की कीमत और लोकतंत्र की चुप्पी’
दोस्तों, जरा सोचिए आज हम रोज अपने फोन से दुनिया से जुड़ते हैं। हम बात करते हैं, वीडियो देखते हैं, काम करते हैं, सवाल पूछते हैं और अपनी राय रखते हैं। इंटरनेट अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी और लोकतांत्रिक भागीदारी का अहम जरिया बन चुका है। लेकिन अगर उसी डेटा के इस्तेमाल पर टैक्स लगाने की बात उठे तो यह सिर्फ आर्थिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र से जुड़ा सवाल बन जाता है। पिछले साल भारत में लगभग २२९ अरब जीबी डेटा इस्तेमाल हुआ। यह बताता है कि डिजिटल दुनिया हमारे जीवन का कितना बड़ा हिस्सा बन चुकी है। लेकिन जब जनता पहले ही डेटा खरीदते समय जीएसटी दे रही है तो उसके इस्तेमाल पर अलग से टैक्स लगाने का विचार स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है अगर सरकार एक रुपया भी टैक्स लगाती है तो इससे मोदी सरकार नाजायज तरीके से २२,९०० करोड़ इकट्ठा करने की तैयारी कर रही है, क्योंकि इंटरनेट आज अभिव्यक्ति और संवाद का मंच भी है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस मुद्दे पर वैसी सार्वजनिक बहस क्यों नहीं दिखती जैसी पहले हुआ करती थी। मीडिया का काम सत्ता से सवाल पूछना और जनता की चिंता को सामने लाना होता है, लेकिन जब सवालों की जगह सफाई और बहस की जगह प्रबंधन दिखाई देने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है। इस लिए जरूरी है कि जनता सवाल पूछने की अपनी आदत को जिंदा रखे और मीडिया उन सवालों को मंच दे, क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत वही है जहां सत्ता जनता से जवाबदेह रहे और नागरिक सवाल पूछने से न डरें।
सत्यमेव जयते
