तौसीफ कुरैशी
अरे वाह! दुनिया के सबसे बड़े ‘शांति-सेवक’ अमेरिका का हाल देखकर हंसी भी आती है और गुस्सा भी। ईरान का सारा तेल तो खर्ग द्वीप पर जमा है, जहां से काला सोना दुनियाभर में बहता है। लेकिन अमेरिका बेचारा इधर-उधर आग लगाने में लगा रहता है। कभी इराक, कभी अफगानिस्तान, कभी लीबिया। अब नजर खर्ग पर टिकी है। योजना बन रही है हमले की। मगर डर के मारे उसका गला सूख रहा है। क्यों? क्योंकि खर्ग पर एक गोली चलाई, तो सीधा युद्ध में चीन को बुलावा! और चीन का नाम सुनते ही पेंटागन के बाबुओं की हिम्मत पसीना छोड़ देती है। ‘अमेरिका तू चोर है, लेकिन चोरी करने से पहले ही कांपने लगा!’
युद्ध का न्योता
खर्ग द्वीप ईरान की रीढ़ है। वहां का एक-एक टैंकर ईरान की अर्थव्यवस्था का दम है। ईरान के तेल का ज्यादातर हिस्सा यहीं से निकलता है। अमेरिका सोचता है कि खर्ग को निशाना बनाकर ईरान को घुटनों पर ला देगा। मूर्ख! भूल गया कि इसी खर्ग से चीन को ९० फीसदी तेल पहुंचता है। हां, ९० फीसदी! चीन का कारखाना चलता है ईरानी तेल पर। बदले में चीन अपने दोस्त ईरान में अरबों डॉलर का निवेश करता है। बंदरगाह, रेल, तेल रिफाइनरी, सब कुछ। ये सिलसिला सालों से चल रहा है। अमेरिका चाहे जितनी सैंक्शन लगाए, चीन और ईरान का यह गठबंधन टूटने वाला नहीं। अब सोचिए, अगर अमेरिका ने खर्ग पर हमला किया तो क्या होगा? पहले तो चीन चुप नहीं बैठेगा। उसका तेल का स्रोत बंद होता देख वह सीधे मैदान में कूद पड़ेगा। यानी युद्ध का न्योता! चीन के पास न सिर्फ ताकत है, बल्कि इरादा भी। रूस पहले से ही ईरान के साथ खड़ा है। त्रिकोण बन जाएगा, ईरान-चीन-रूस। अमेरिका का नाटो तो दूर-दूर तक फंस जाएगा। खर्ग पर हमला मतलब हार्मूज जलडमरूमध्य में तेल का बहाव बंद। दुनिया का तेल व्यापार ठप। और क्रूड का दाम? दो सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगा। हां, दो सौ! जो आज ७०-८० डॉलर के आस-पास है, वह रातोंरात आसमान छू लेगा।
भारत का क्या होगा? हमारा देश भी ईरानी तेल का बड़ा खरीदार रहा है। सस्ता तेल मिलता था, लेकिन अमेरिका की सैंक्शन ने रास्ता रोका। अब अगर खर्ग उड़ गया तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें क्या होंगी? किसान ट्रैक्टर में डीजल डालते-डालते रोएंगे। आम आदमी बस-ट्रेन का किराया देखकर घर बैठ जाएगा। उद्योग बंद पड़ेंगे। महंगाई का तूफान आएगा, लेकिन अमेरिका को क्या? उसका तो तेल सऊदी से भी आता है, लेकिन असल मकसद तो ईरान को कुचलना है। यह ‘आग लगाओ और तमाशा देखो’ वाली नीति पुरानी है। लेकिन इस बार खर्ग में फंस गया है।
देखिए न, अमेरिका कितना बेवकूफ है। इराक पर हमला किया, सद्दाम को फांसी दी, लेकिन तेल के दाम बढ़े। लीबिया में गद्दाफी को मार डाला, फिर भी अस्थिरता बढ़ी। अफगानिस्तान से भागा, तालिबान वापस आ गए। अब ईरान पर नजर। मगर ईरान अकेला नहीं। खर्ग द्वीप पर हमला चीन के लिए सीधा चैलेंज है। चीन कह रहा है, ‘हमारा तेल छेड़ोगे तो हम भी छेड़ेंगे।’ बीजिंग का निवेश ईरान में इतना गहरा है कि एक-एक डॉलर का हिसाब है। ईरान चीन को तेल देता है, चीन पैसा और हथियार। ये दोस्ती कागज पर नहीं, तेल की पाइपलाइन में बंधी है।
विश्व युद्ध की आहट
अमेरिका के जनरल सोचते होंगे कि हम हवाई हमला कर देंगे, खर्ग उड़ा देंगे। लेकिन भाई, युद्ध इतना आसान नहीं। खर्ग द्वीप समुद्र में है, लेकिन उसके आस-पास ईरानी मिसाइलें तैनात हैं। चीन के पास सैटेलाइट हैं, रूस के पास हथियार। एक हमला हुआ कि पूरा गल्फ आग का समंदर बन जाएगा। तेल के टैंकर डूबेंगे। बीमा कंपनियां दिवालिया हो जाएंगी। यूरोप-अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी हिल जाएगी। लेकिन सबसे बड़ा झटका तो चीन को लगेगा और चीन चुप बैठने वाला नहीं। वह ताइवान पर दबाव बढ़ा सकता है या दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी नौसेना को घेर सकता है। यानी विश्व युद्ध की आहट! ‘सत्ता अंधी होती है।’ अमेरिका की सत्ता आज भी उसी अंधेपन में है। सोचता है दुनिया उसकी मुट्ठी में है, लेकिन भूल जाता है कि तेल की कीमतें सिर्फ डॉलर नहीं, बल्कि खून की भी होती हैं। खर्ग पर हमला मतलब लाखों निर्दोषों की मौत। ईरान के बच्चे, औरतें, किसान सब तबाह। लेकिन अमेरिका को क्या फर्क पड़ता है? उसका तो सिर्फ तेल और बाजार चाहिए। मगर इस बार हिसाब गलत पड़ रहा है। चीन का ९० फीसदी तेल यहीं से आता है। अगर यह रुक गया तो चीन की पैâक्टरियां बंद। बीजिंग चुप नहीं रहेगा। अब सवाल यह है अमेरिका हमला करेगा या नहीं? उसके गले में सूखापन है, लेकिन जुबान पर अभी भी ‘डेमोक्रेसी’ का झूठा नारा है। इजराइल भी पीछे खड़ा है, लेकिन अकेला कुछ नहीं कर पा रहा। सऊदी अरब भी चुप है, क्योंकि उसे भी डर है कि तेल का बाजार बिगड़ जाएगा। दुनिया देख रही है। भारत को सतर्क रहना चाहिए। हम न तो अमेरिका के गुलाम हैं, न चीन के। लेकिन तेल की कीमत दो सौ डॉलर हुई तो हमारी जनता सड़कों पर आ जाएगी। सरकार को अब से ही वैकल्पिक रास्ते ढूंढने चाहिए रूस से ज्यादा तेल, वेनेजुएला से या फिर स्वदेशी ऊर्जा पर जोर। अमेरिका, सुन ले! खर्ग पर हाथ मत डाल। तेरी आग लगाने की आदत पुरानी है, लेकिन इस बार आग तुझे ही जला देगी। चीन खड़ा है, ईरान तैयार है और दुनिया तेरा असली चेहरा जानती है तथा पहले भी देख चुकी है। अगर हमला किया तो याद रख क्रूड २०० डॉलर पर पहुंचेगा, लेकिन अमेरिका की ‘महाशक्ति’ की इज्जत जीरो पर! ये कोई फिल्म नहीं, असली युद्ध है और युद्ध में कभी-कभी छोटा द्वीप भी बड़े साम्राज्य को डुबो देता है।
खर्ग द्वीप सिर्फ तेल का गोदाम नहीं, बल्कि अमेरिकी घमंड का कब्रिस्तान साबित होगा। डर के मारे गला सूखा है न? तो चुपचाप बैठ जा। वरना, इतिहास तुझे कभी माफ नहीं करेगा।
सत्यमेव जयते
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार है एवं राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर नियमित लिखते हैं इन विषयों पर बारिक नजर रखते है और उसका बेबाकी एवं निडरता से विश्लेषण करते हैं।)
