तौसीफ कुरैशी
भाइयो और बहनों, सुनो तो जरा… अमरीका नाम का यह महाशक्तिशाली राक्षस, जिसके मुंह से हर वक्त ‘शांति’ और ‘लोकतंत्र’ का जाप निकलता है, आज फिर एक बार अपने ही खजाने को खून से सींच रहा है। ट्रंप की अगुवाई में ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम का यह नया तमाशा शुरू हुआ है ईरान पर। एक बार फिर इंसानियत के कत्ल का मैदान बनाया गया है इसके पीछे एप्सटीन का कर्ताधर्ता अदृश्य शक्ति रोज चाइल्ड परिवार है ये तो पियादे मात्र है। और क्या कहें, सिर्फ एक महीने की इस जंग का अनुमानित खर्र्च १८.८७ लाख करोड़ रुपये! हां, ठीक पढ़ा आपने। भारतीय बजट का लगभग ४० प्रतिशत! जरा सोचिए, हमारा पूरा साल का बजट अगर आधा से ज्यादा इस एक महीने की बमबारी पर लग जाए, तो क्या हाल होगा? लेकिन अमरीका के लिए तो यह महज ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का खेल है इस खेल की पूर्ति के लिए टैरिफ लगा कर हम जैसे मुल्कों से पूरा कर लिया जाएगा क्योंकि हर जगह पर एप्सटीन फाइल के रबर स्टैंप बैठे हुए हैं।वैसे ही अपने देश को लुटवा देने के लिए डील कर लेते हैं जैसे उनके पिता श्री कहते हैं। ‘सत्ता जब जहर पीती है तो दुनिया को शराब के फायदे समझाती है। आज ठीक वही हो रहा है। अमरीकन एक्सपर्ट्स खुद चीख़ रहे हैं कि ट्रंप की इस जंग ने अमरीका को आर्थिक तबाही की राह पर डाल दिया है। पहले २४ घंटों में ही ६,९९० करोड़ रुपये उड़ा दिए गए। सुनकर हैरानी होती है, मगर इंसानियत के कातिलों को नहीं होती। यह राशि हमारे नॉर्थ ईस्ट के किसी एक छोटे राज्य के पूरे साल के बजट के बराबर है! एक ‘एयर स्ट्राइक ग्रुप’ चलाने में रोज ५८ करोड़ रुपये। और अमरीका ने दो ऐसे ग्रुप लगा रखे हैं, शायद और भी बढ़ा दे। तैयारी के नाम पर पहले ही ५,५५६ करोड़ रुपये फूंक दिए। यह जंग शुरू होने से पहले का हिसाब है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के आंकड़े तो और भी चौंकाते हैं। अमरीका ने इजरायल को २१.७ अरब डॉलर की फौजी मदद दी। यमन जैसे इलाकों में कार्रवाई पर १२ अरब डॉलर। ईरान पर डायरेक्ट-इनडायरेक्ट कुल ३२-३४ अरब डॉलर भारतीय रुपयों में २८ से ३४ लाख करोड़ तक का खेल! भारतीय बजट का ६० प्रतिशत से ज्यादा सिर्फ एक मुल्क को ‘जलाने’ में। अरे वाह! यह पैसा कहां से आता है। नॉन बॉलोजिकल जैसे अपने देश के खून पसीने की कमाई से। टैक्सपेयर की जेब से। लेकिन असली कमाई किसकी? संघियों के फादरलैंड इजरायल और अमरीका के जायोनिष्ट हथियार व्यापारियों की। अगर यह जंग लंबी चली तो ये आदमखोर दुनिया के देवता ५० लाख करोड़ से ़ज्यादा का मुनाफा कमा लेंगे। नॉन बॉलोजिकल जैसे भी नहा लेंगे इस खूनी दरिया में। ट्रंप और संघियों के पितातुल्य नेतन्याहू पर तो भ्रष्टाचार के ढेर सारे इल्जाम हैं। जंग में हिसाब-किताब कौन मांगता है? देशभक्ति का फर्जीर्r नारा लगाओ और खजाना लूट लो। ईरान? वह गरीब मुल्क है, मगर उसकी रूह अमीर है। खामनेर्ई शहीद हो गए, लेकिन उनकी शहादत जिंदा खामनेई से ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है। ईरानी लोग एक वक्त का खाना खाकर बरसों गुजार सकते हैं। वे भूख के आदी हैं, लेकिन सिर झुकाने के आदी नहीं। अमरीकी? वे भूख नहीं सह सकते। वे फाइनेंस के उस्ताद हैं। वे ५० लाख करोड़ का हिसाब जरूर मांगेंगे। लेकिन किससे? ट्रंप से? हाहा! वह तो कहेगा ‘यह तो राष्ट्रीय हित है।’ दुनिया भर के मासूमों का कत्ल करके मुल्कों को तबाह करके डॉलर कमाए जा रहे हैं। हर डॉलर पर बेगुनाहों के खून का दाग। यही डॉलर फिर बाजार में घूमेगा, नई ग़ुलामी पैदा करेगा। अप्रâीका, एशिया, लैटिन अमेरिका हर जगह के गरीब इस खून के पैसे से बंध जाएंगे। अमरीकी फौज सबसे बड़ी तेल खपत करने वाली मशीन है। प्रदूषण का बादशाह। लेकिन इंसानियत? वह तो कब की मर चुकी।
जरा सोचिए, यह पैसा अगर स्कूलों, अस्पतालों, गरीबी हटाने पर लगता तो दुनिया कितनी बेहतर होती। लेकिन नहीं, साम्राज्यवाद को तो खून चाहिए। ‘जब तक हथियारों का कारोबार चलेगा, शांति का नारा सिर्फ धोखा रहेगा।’ आज ठीक वही हो रहा है। ईरान पर हमले की आड़ में मासूमों के कातिल इजरायल की सुरक्षा, लेकिन असल में तेल, हथियार और ताकत का खेल। यमन में हूती हमले, लेबनान में हिजबुल्लाह सब एक साज़िश का हिस्सा। और हम? हम भारतीय? हम तो सिर्फ देखते रहें। हमारा बजट तो अमरीका की जंग के मुकाबले छोटा है, लेकिन हमारी इंसानियत बड़ी थी। अब वह भी अमेरिका की गुलामी कर रही है, इतिहास माफ नहीं करेगा। इंसानियत की बर्बादी के लिए हो रही यह जंग रुकनी चाहिए। इंसानियत बचनी चाहिए। खामनेई की शहादत ने साबित कर दिया लाशें भी लड़ सकती हैं। अमरीका का यह खून-महंगा खेल एक दिन खुद को ही निगल जाएगा। अमेरिकी जनता एक दिन पूछेगी हमारे टैक्स का पैसा कहां गया? जवाब मिलेगा अच्छे खासे मुल्क ईरान को कब्रिस्तान बनाने में, बनेगा या नहीं ये वक्त बताएगा। ट्रंप और नेतन्याहू, याद रखो इतिहास गवाह है, हर साम्राज्यवादी आखिर में अपनी ही लाश पर गिरता है। ईरानी एक वक्त का खाना खाकर जी लेंगे, लेकिन तुम्हारी भूख कभी नहीं मिटेगी। क्योंकि तुम्हारी भूख सत्ता की है, मासूमों और इंसानियत के खून की है। जंग बंद करो। मासूमों को बचाओ। डॉलर के पीछे खून मत बहाओ। इंसानियत की कीमत किसी बजट में नहीं आती।
सत्यमेव जयते
