तौसीफ कुरैशी
‘दुनिया झुकती है, झुकानेवाला चाहिए’ यह कहावत अक्सर ताकत की राजनीति में बड़े गर्व से दोहराई जाती है। लेकिन जब ताकत की यह जिद युद्ध में बदल जाती है, तब उसका बोझ सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया उसकी कीमत चुकाने लगती है।
असमंजस में भारत
आज अमेरिका और ईरान के बीच जो टकराव है, वह उसी जिद की कहानी लिख रहा है। युद्ध के इतिहास में हमने कई बड़े संघर्ष देखे हैं। कभी महाशक्तियों के बीच शीतयुद्ध, कभी क्षेत्रीय युद्ध, कभी तेल के लिए, कभी सत्ता के लिए। लेकिन इस बार जो स्थिति बन रही है, उसमें युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि बयानबाजी, मनोवैज्ञानिक दबाव और आर्थिक असर के जरिए पूरी दुनिया को अपने घेरे में ले रहा है। उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य क्षमता, सबसे बड़ा रक्षा बजट और वैश्विक सैन्य नेटवर्क है।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। कई बार कमजोर समझा जाने वाला पक्ष भी अपने धैर्य और रणनीति से बड़ी ताकत को उलझाकर रख देता है। ईरान की रणनीति भी कुछ ऐसी ही है, सीधी भिड़ंत से ज्यादा क्षेत्रीय दबाव और मनोवैज्ञानिक संदेश। इस टकराव का सबसे बड़ा असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। पश्चिम एशिया केवल राजनीतिक संघर्ष का इलाका नहीं है, बल्कि यह दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की धमनियों में से एक है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछल जाती हैं। तेल महंगा होता है तो उसके साथ ही परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों की लागत भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि अमेरिका और ईरान का संघर्ष केवल सैन्य मुद्दा नहीं रह जाता। इसका असर सीधे आम आदमी की रसोई तक पहुंचता है। कहीं पेट्रोल महंगा होता है, कहीं रसोई गैस की कमी की खबरें आती हैं और कहीं उद्योगों की लागत बढ़ने से आर्थिक दबाव बढ़ जाता है। लेकिन इस पूरी कहानी में एक और देश है, जिसकी भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं और वह है भारत।
भारत लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता की नीति का पक्षधर रहा। दुनिया के दो ध्रुवों के बीच खड़े होकर उसने संतुलन की राजनीति की। पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी उसके संबंध संतुलित रहे एक तरफ खाड़ी देशों के साथ आर्थिक रिश्ते, दूसरी तरफ ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध। लेकिन आज जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, भारत का रुख कई लोगों को असमंजस भरा दिखाई देता है। एक तरफ अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी है, दूसरी तरफ ऊर्जा जरूरतों के कारण खाड़ी और ईरान से रिश्तों की मजबूरी भी है।
कूटनीतिक परीक्षा
इस दोराहे पर भारत की विदेश नीति कई बार स्पष्ट दिशा के बजाय एपस्टीन और गौतम अडाणी के मुकदमे के दबावों के बीच झूलती हुई नजर आती है। यही कारण है कि आलोचक कहने लगे हैं कि इस संकट ने भारत की विदेश नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया है।
एक समय था जब भारत वैश्विक मंचों पर स्वतंत्र आवाज के रूप में देखा जाता था, लेकिन संघियों की संकीर्ण मानसिकता ने उसे कहां लाकर खड़ा कर दिया है। आज ऐसा लगता है कि वह बड़ी ताकतों के समीकरणों के बीच संतुलन साधने में ही उलझा हुआ है। भारत के सामने चुनौती केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि आर्थिक भी है। खाड़ी क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। अगर यहां अस्थिरता बढ़ती है तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और समाज पर पड़ेगा। यही वह स्थिति है, जिसमें भारत की विदेश नीति की परीक्षा हो रही है। क्या वह केवल परिस्थितियों के साथ बहता रहेगा या फिर अपने हितों और सिद्धांतों के आधार पर स्पष्ट रुख भी दिखाएगा? राजनीति की असली पहचान संकट के समय होती है। सामान्य दिनों में सब कुछ संतुलित दिखाई देता है, लेकिन असली चरित्र तब सामने आता है जब हालात कठिन हो जाते हैं। आज दुनिया एक ऐसे ही कठिन दौर से गुजर रही है। अमेरिका और ईरान की टकराहट केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति की परीक्षा बन चुकी है।
और इसी परीक्षा में भारत भी खड़ा है एक ऐसे मोड़ पर, जहां उसे तय करना है कि वह केवल दर्शक बना रहेगा या फिर अपनी आवाज और अपने हितों के साथ इस वैश्विक उथल-पुथल में कोई स्पष्ट भूमिका भी निभाएगा। क्योंकि अंत में सवाल वही रह जाता है जंग में जीत चाहे जिसकी भी हो, लेकिन अगर नीति कमजोर हो जाए तो सबसे बड़ी हार उसी की होती है, जो अपनी दिशा खो देता है।
सत्यमेव जयते
