– ११८ डॉलर पर पहुंचा दाम, १५० तक जाने के आसार
-दो दिनों में ३० प्रतिशत उछला भाव, ओपेक ने ७०ज्ञ् उत्पादन घटाया
सामना संवाददाता / मुंबई
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच भड़के युद्ध ने महंगाई को भड़का दिया है। क्रूड ऑयल के भाव जोरदार तरीके से उछलते हुए १०० डॉलर की सीमा पार कर गए हैं। इससे हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगना तय है। ब्रेंट क्रूड का भाव कल ११८ तक पहुंच गया जो दो दिन पहले तक ८० डॉलर था।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि आम तौर पर जब ब्रेंट क्रूड की कीमत १०० डॉलर से ऊपर जाती है तो शेयर बाजार पर दबाव बढ़ने लगता है और निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, अभी तेल की कीमतों में जो तेजी दिख रही है, वह खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और तेल सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता की वजह से है।
ओपेक देशों ने घटाया कच्चे तेल का उत्पादन
सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत में भारी उछाल देखा गया। कारोबार में यह करीब ३० फीसदी बढ़कर ११८ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह तेजी उस समय आई जब ईरान युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से कई तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन घटा दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र के कई बड़े तेल उत्पादक देशों ने एहतियात के तौर पर तेल उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है। कुवैत, जो ओपेक का पांचवां सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, उसने अपने उत्पादन और रिफाइनरी आउटपुट में कटौती की घोषणा की है। वहीं इराक, जो ओपेक का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, उसने अपने तीन प्रमुख तेल क्षेत्रों से उत्पादन लगभग ७० फीसदी घटाकर करीब १.३ मिलियन बैरल प्रतिदिन कर दिया है।
आयात बिल बढ़ेगा
विश्लेषकों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर शेयर बाजार पर कई तरह से पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ेगी। कंपनियों की लागत बढ़ती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का करीब ८०–८५ फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग ५० फीसदी सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आती है। ऐसे में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ जाता है और आर्थिक वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है।
कई सेक्टरों पर दबाव
अगर कच्चे तेल की कीमतें ज्यादा समय तक ऊंची रहती हैं तो कई सेक्टरों पर दबाव बढ़ सकता है। इनमें ऑटोमोबाइल, एविएशन, तेल विपणन कंपनियां, सिटी गैस कंपनियां, बिल्डिंग मटेरियल और उपभोक्ता से जुड़े सेक्टर शामिल हैं। इसके अलावा खाड़ी देशों में कारोबार करने वाली निर्यात आधारित कंपनियों पर भी असर पड़ सकता है।
