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मुस्लिम वर्ल्ड : गद्दारों का हिसाब शुरू! …जंग के बीच क्या कर रहा ईरान?

सूफी खान

ईरान तो मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर दनादन हमले कर ही रहा है, साथ ही इजरायल पर भी ईरान की मिसाइलें गिर रही हैं और बड़े नुकसान कर रही हैं, लेकिन ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हालिया हमलों ने सिर्फ उसके सैन्य ढांचे को ही नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। ईरान में जिन ठिकानों को अमेरिका-इजरायल ने निशाना बनाया वो कोई सामान्य जगह नहीं थीं, बल्कि बेहद संवेदनशील और हाई-सिक्योरिटी जोन थे।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इजरायल को इतनी सटीक जानकारी वैâसे मिल रही थी, क्या यह सिर्फ तकनीकी ताकत का मामला है या फिर ईरान के भीतर ही कोई बड़ा लीक, कोई बड़ा गद्दार मौजूद है। मीडिया रिपोर्ट बता रही हैं कि यही कारण है कि अब तेहरान को अपने ही सिस्टम पर शक होने लगा है और उसने बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब ६०० लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिन पर इजरायल के लिए जासूसी करने का आरोप है। यह संख्या अपने आप में बताती है कि मामला कितना गंभीर हो चुका है और ईरान इसे सिर्फ बाहरी खतरा नहीं, बल्कि अंदरूनी घुसपैठ के रूप में देख रहा है। इसी कार्रवाई के दौरान एक मामला खास-तौर पर चर्चा में आया है, जिसमें २७ साल के एक युवक अगिल केशावर्ज को जासूसी के जुर्म में सजा दी गई है। ईरानी अधिकारियों ने आरोप लगाया कि वह इजरायल की खुफिया एजेंसी के लिए काम कर रहा था और उसने २०० से ज्यादा मिशन पूरे किए थे जिनमें संवेदनशील सैन्य ठिकानों की तस्वीरें लेना, रणनीतिक इलाकों का सर्वे करना और खास जगहों पर मूवमेंट की निगरानी शामिल थी। एक्सपर्ट कहते हैं कि जासूसी का यह नेटवर्क अब पूरी तरह डिजिटल हो चुका है और ट्रैक करना मुश्किल होता जा रहा है। चाहे सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई पर अटैक और उनकी हत्या हो या फिर १७ मार्च को ईरान की सुप्रीम सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ अली लारिजानी को मौत के घाट उतारे जाना। ये हमले इतने सटीक और समयबद्ध दिखाई देते हैं, जो इशारा करते हैं कि जमीन से मिली जानकारी और तकनीकी इंटेलिजेंस उनके पीछे है। डिफेंस के कई एक्सपर्ट मानते हैं कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ मिसाइल और बम का नहीं, बल्कि डेटा और जानकारी का खेल बन चुका है। जहां एक छोटी सी जानकारी भी बड़े हमले की नींव बन सकती है। ऐसे में ईरान भी अपने यहां गद्दारों को पकड़ने, उन्हे बेनकाब करने की मुहिम चलाए हुए है। ईरान ये समझ रहा है कि वह एक असामान्य सुरक्षा खतरे का सामना कर रहा है, जहां दुश्मन सीमा के बाहर ही नहीं, बल्कि देश के भीतर भी मौजूद हैं। यही कारण है कि अब यह लड़ाई सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि सिस्टम के अंदर भी लड़ी जा रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इजरायल के सटीक हमलों के पीछे सिर्फ उसकी सैन्य ताकत नहीं, बल्कि मजबूत खुफिया नेटवर्क, अंदरूनी स्रोतों से मिली ज्ाानकारी और आधुनिक डिजिटल कम्युनिकेशन सिस्टम की बड़ी भूमिका नजर आती है। आरोप लगता रहा है कि इजरायल की खुफिया एजेंसियों के लोग ईरान में हैं। यही वजह रही कि जनवरी २०२६ की शुरुआत में बड़े पैमाने पर हुए महंगाई विरोधी प्रदर्शन हिंसक हो गए और मौजूद इस्लामिक इंकलाब की गवर्मेंट के खिलाफ होते चले गए, जिसकी परिणति युध्द के रुप में सामने आई है।

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