जेदवी / मुंबई
मुंबई को ‘स्मार्ट’ और ‘आधुनिक’ बनाने के दावे एक बार फिर जोर पकड़ रहे हैं, लेकिन मेट्रो-३ के २७ स्टेशनों के आसपास लोकल एरिया प्लान लागू करने के पैâसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मनपा ने २०२८ तक इस योजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा है, मगर जमीनी हकीकत और पुराने अनुभव कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। मेट्रो स्टेशनों के आसपास भूमि उपयोग, ट्रैफिक और इंप्रâास्ट्रक्चर के नाम पर बड़े पैमाने पर बदलाव की बात कही जा रही है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस तरह की योजनाएं अक्सर आम लोगों से ज्यादा बिल्डरों और बड़े निवेशकों के लिए फायदेमंद साबित होती हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या यह ‘प्लानिंग’ आम मुंबईकर के लिए है या फिर रियल एस्टेट को चमकाने का नया जरिया?
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट के तहत मेट्रो के आसपास ज्यादा घनत्व वाला विकास होगा। इसका सीधा असर यह हो सकता है कि पहले से ही भीड़भाड़ वाले इलाकों में और अधिक दबाव बढ़े। क्या मौजूदा बुनियादी ढांचा इस अतिरिक्त बोझ को झेल पाएगा, इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा। पहले चरण के लिए १.३७ करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है, जिसे जीएसटी छूट के साथ मंजूरी दी गई है। लेकिन इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए यह राशि ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो सकती है। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि शुरुआती प्लानिंग के बाद लागत कई गुना बढ़ सकती है और आखिरकार इसका बोझ जनता पर ही पड़ेगा।
योजना में पैदल यात्रियों, साइकिल ट्रैक, हरित क्षेत्र और स्मार्ट सुविधाओं की बात जरूर की जा रही है, लेकिन मुंबई में पहले भी कई परियोजनाओं में ऐसे वादे अधूरे ही रह गए हैं। सवाल यह है कि क्या इस बार भी ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा? दावा किया जा रहा है कि इससे ट्रैफिक जाम कम होगा, लेकिन विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि ज्यादा घनत्व और व्यावसायिक गतिविधियों के चलते ट्रैफिक और बढ़ सकता है। बिना ठोस ट्रैफिक प्लान के यह योजना उल्टा असर भी डाल सकती है।
२०२८ का लक्ष्य-फिर एक लंबा इंतजार?
मुंबई में बड़े प्रोजेक्ट्स के समय पर पूरे होने का इतिहास ज्यादा भरोसेमंद नहीं रहा है। ऐसे में २०२८ का लक्ष्य भी सवालों के घेरे में है। अब देखने वाली बात यह होगी कि मेट्रो-३ के नाम पर शुरू हुई यह ‘महायोजना’ वास्तव में मुंबईकरों को राहत देगी या फिर यह भी एक और अधूरी कहानी बनकर रह जाएगी।
