मुट्ठी से फिसलती रेत है यह जीवन की डगर,
धूप-छांव के खेल में बीत रहा हर एक पहर।
कभी खुशियों के गीत, कभी सिसकियों का शोर,
अनजानी सी राहों पर खिंचती सांसों की डोर।
बचपन की वो गलियां अब बस यादों में बस्ती हैं,
जहां बेफिक्र सी हंसी और खिलौनों की मस्ती है।
वो माँ की लोरी का सुकून, पिता का वो साया,
वक्त की आंधी ने सब कुछ धुंधला है बनाया।
रिश्तों की कच्ची डोर पर उम्मीदों का भार है,
भीड़ में भी देखो आज हर शख्स बेकरार है।
पत्थरों के शहर में अब दिल ढूंढता है घर,
कहां खो गया अपनापन, कहां गया वो सफर?
आंखों में सजे सपने अब थक कर चूर हैं,
मंजिल तो पास है, पर हम खुद से दूर हैं।
चेहरे की झुर्रियों में लिखे हैं संघर्ष के किस्से,
बंट गए हम न जाने कितने अनचाहे हिस्सों में।
पर हार मत ऐ राही, अभी मशाल जलना बाकी है,
इस राख के ढेर में भी, एक चिंगारी बाकी है।
बीते कल को छोड़कर, तू आज को गले लगा,
मिट्टी का ये तन सही, पर रूह को तू जगा।
-अंकित सोनी निशांत
धार (म.प्र.)
