यह चेहरे…

रिश्तों के रंग ‘बदलते’ यह चेहरे,
जिंदगी में क्यों साथ छोड़ देते हैं?
उम्मीदों का यह दामन न जाने क्यों खत्म हो रहा,
लगता है उनके चेहरे पर नकाब लगा है।
क्यों डुबा हुआ हूं मैं तेरे प्यार में!
हर वक्त तुझे ही तलाशता रहता हूं
पर तूने साथ छोड़ दिया है मझधार में…
रिश्तों के रंग ‘बदलते’ यह चेहरे।
उम्मीद अब भी है, फिर आएगी बहार,
वसंत का वह दौर, फागुन की बेला में
आम के ‘बौर’ या सावन की मस्त फुहार,
तेरे आने का संदेशा जरूर लाएगी,
बदलते वक्त में, रिश्तों के रंग बदलते यह चेहरे।
तू पतंग बन दूर गगन में उड़ रही है अभी,
पर डोर तो मेरे हाथों में है प्यार की।
तूने नहीं निभाया साथी मेरा साथ,
तभी तो सामने है, रिश्तों के रंग बदलते यह चेहरे…॥
-हरिहर सिंह चौहान, इंदौर

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