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ट्रंप की यारी, पाकिस्तान पर भारी … हनीमून पीरियड समाप्ति की ओर!

-मनमोहन सिंह
अमेरिकी इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड की यह चेतावनी कि अमेरिका के लिए ईरान नहीं पाकिस्तान सबसे बड़ा परमाणु खतरा है, पाकिस्तान की नींद उड़ाने के लिए काफी है! तुलसी गबार्ड का पाकिस्तान को रूस-चीन वाली लीग में खड़ा करना इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के बदलते मिजाज को दिखाता है। ऐसा लगता है कि अब वॉशिंगटन में `प्रâेंड्स एंड डिप्लोमेसी’ वाले चश्मे उतारकर केवल थ्रेट एसेसमेंट वाले चश्मे से दुनिया को देखा जा रहा है। मजेदार लहजे में कहें तो, अमेरिका अब उस सीजंड `हीरो’ जैसा व्यवहार कर रहा है, जिसे अचानक पता चला है कि उसके पड़ोस के सारे लड़के उससे भी ज्यादा एक्सपर्ट बन चुके हैं और चोरी चुपके उसको भी चुनौती दे सकते हैं! सेम माइंडेड आसपास के बस्तियों के लड़कों के साथ!
तो अब क्या करेगा अमेरिका? `न्यूक्लियर क्लब’ की नई परिभाषा के प्रâेम में पाकिस्तान को जड़ेगा! अमेरिका अब तक पाकिस्तान को एक `अनस्टेबल एलॉय’ मानता था, लेकिन उसे रूस और चीन के साथ एक ही कतार में खड़ा करना यह दर्शाता है कि अब रियायतें खत्म हो गई हैं। अमेरिका शायद अब पाकिस्तान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और परमाणु निगरानी को और सख्त करने का दबाव बनाएगा।
जब खतरा ३,००० से बढ़कर १६,००० मिसाइलों का हो, तो अमेरिका का अगला कदम अपने मिसाइल डिफेंस प्रोग्राम (जैसे थाड या जीएमडी) पर अरबों डॉलर खर्च करना होगा। यानी दुनिया में एक नई `हथियारों की होड़’ शुरू होना तय है।
`दुश्मन का दुश्मन दोस्त’
पाकिस्तान को चीन और रूस के करीब जाता देख, अमेरिका भारत के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा संबंधों (आईसीईटी, प्रेडेटर ड्रोंस आदि) को और ज्यादा मजबूती देगा। दक्षिण एशिया में भारत अब अमेरिका के लिए केवल एक पार्टनर नहीं, बल्कि एक `बफर’ की तरह होगा। लेकिन साथ ही यह भी सोचा जाना चाहिए कि कहीं यह अमेरिका की डिप्लोमेटिक चाल तो नहीं है? दिलचस्प बात यह है कि जहां गबार्ड पाकिस्तान को बड़ा खतरा बता रही हैं, वहीं ईरान के परमाणु कार्यक्रम को `निष्क्रिय’ मान रही हैं। यह शायद एक कूनीतिक चाल है। एक तरफ से तनाव कम करना ताकि दूसरी तरफ (चीन-रूस-पाक गठजोड़) पर पूरा ध्यान लगाया जा सके। यह एक कड़वी हकीकत है कि अमेरिका जब किसी को `खतरा’ घोषित करता है, तो वह अक्सर अपनी रक्षा बजट बढ़ाने या अपनी विदेश नीति में बड़े यू-टर्न लेने की भूमिका बना रहा होता है। यानी अब पाकिस्तान निशाने पर है! इसे पाकिस्तान का `हनीमून पीरियड’ का अंत भी कह सकते हैं। क्योंकि Dाब तक अमेरिका पाकिस्तान को `मेजर नॉन-नाटो एलाय’ का टैग देकर `पुचकारता’ रहता था, ताकि अफगानिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ उसे इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन उसे रूस-चीन के साथ खड़ा करना यह संकेत है कि अब वॉशिंगटन ने मान लिया है कि पाकिस्तान अब `सुधरने वाला’ नहीं, बल्कि `खतरनाक’ हो गया है। नतीजतन अब `मदद’ की जगह `निगरानी’ यानी सैंक्शंस एंड मॉनिटरिंग की बातें ज्यादा होंगी। ईरान को `कम खतरा’ बताना वाकई एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है। इसे `डी-एस्केलेशन फॉर कंसंट्रेशन’ कह सकते हैं। अमेरिका को पता है कि वह एक साथ तीन मोर्चों (रूस, चीन और ईरान) पर नहीं लड़ सकता। इसलिए एक को `ठंडा’ बताकर अपना पूरा ध्यान उस `बड़े खतरे’ यानी ग्रेटर पावर कंपटीशन पर लगाना चाहता है, जहां परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ रहा है।
लब्बोलुआब यह कि पाकिस्तान के लिए अब `दो नावों की सवारी’ का समय खत्म हो गया है। पाकिस्तान के लिए अब यह चुनना मुश्किल होगा कि वह चीन का `जूनियर पार्टनर’ बना रहे या अमेरिका के `स्वैâनर’ से बचने की कोशिश करे।

 

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