सूरज सिंह
तारीख १२ फरवरी १९८१ सिद्धिविनायक मंदिर के पास पेट्रोल पंप, प्रभादेवी, मुंबई में शब्बीर इब्राहिम पर उस समय हमला किया गया, जब वे अपने वाहन के पास खड़े थे। हमलावरों ने नजदीक से गोलीबारी कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। मुख्य हमलावर में नाम आया पठान गैंग के अमीरजादा खान, आलमजेब और मान्या सुर्वे का। यह हमला कथित रूप से करीम लाला के प्रभाव वाले पठान गिरोह से जुड़े अपराधियों द्वारा अंजाम दिया गया माना जाता है।
हत्या की वजह वर्चस्व की लड़ाई
उस समय मुंबई में तस्करी, उगाही, हवाला और संरक्षण वसूली जैसे अवैध कारोबारों पर नियंत्रण को लेकर गिरोहों के बीच तनाव चरम पर था। दाऊद और शब्बीर का तेजी से बढ़ता नेटवर्क पुराने गिरोहों के आर्थिक हितों के लिए सीधी चुनौती बन रहा था।
शब्बीर की हत्या के बाद दाऊद ने बदला लेने की कसम खाई
डी-कंपनी और पठान गिरोह के बीच खुली गैंगवॉर शुरू हुई। शहर में सुपारी हत्याओं हत्याओं और गोलीबारी की घटनाए बढ़ती चली गईं। तस्करी मार्गों और उगाही क्षेत्रों पर हिंसक कब्जे की लड़ाई तेज हो गई। इस दौर में अपराध जगत से जुड़े कई नाम सामने आए और अंडरवर्ल्ड में भय का माहौल पैâल गया। गैंगवार के दौरान दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे के सदस्यों को निशाना बनाया। १९८६ में दाऊद गिरोह से जुड़े लोगों ने करीम लाला के भाई रहीम खान की हत्या कर दी। इसे शब्बीर की हत्या का बदला माना गया
मुंबई अंडरवर्ल्ड का उभार पृष्ठभूमि
१९६० के दशक में मुंबई तेजी से व्यापारिक महानगर बन रहा था। विदेशी वस्तुओं पर प्रतिबंध और ऊंचे आयात शुल्क के कारण तस्करी का अवैध कारोबार फलने-फूलने लगा। इसी दौर में हाजी मस्तान ने सोना और इलेक्ट्रॉनिक सामान की तस्करी के जरिए मजबूत नेटवर्क खड़ा किया। इसके समानांतर करीम लाला के नेतृत्व में पठान गिरोह दक्षिण मुंबई में वसूली और संरक्षण व्यवस्था पर नियंत्रण रखता था।
