मुख्यपृष्ठस्तंभअंडरवर्ल्ड सीक्रेट : मुंबई का असली दादा बाशू की कहानी

अंडरवर्ल्ड सीक्रेट : मुंबई का असली दादा बाशू की कहानी

सूरज सिंह
एक दिन तेली मोहल्ले में तीन पहलवान—खलीद, रहीम और लाल खान—अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। तभी वहां बाशू दादा अपनी महंगी मर्सिडीज कार से पहुंचा। उसने इन पहलवानों को चुनौती दी कि वे बिना रुके १०० ‘जोर’ (पुश-अप्स) लगाकर दिखाएं। खलीद और रहीम ने पूरी कोशिश की, लेकिन वे १०० तक नहीं पहुंच सके। वहीं बाशू दादा ने न केवल १००, बल्कि १२० जोर लगाकर अपनी ताकत और दबदबा साबित कर दिया। इसके बाद उसने अपने साथियों को बादाम शरबत पिलाकर एक तरह से अपनी जीत का जश्न मनाया।
बाशू दादा का यह रौब केवल शारीरिक ताकत तक सीमित नहीं था। वह तस्करी के बड़े नेटवर्क का संचालन करता था और डोंगरी इलाके में उसका पूरा नियंत्रण था। पुलिस भी अक्सर उससे दूरी बनाए रखती थी और कई बार उसकी मदद से छोटे अपराधियों को पकड़ती थी। हालांकि, यह संबंध पूरी तरह से औपचारिक नहीं था—कई बार पुलिस की कार्रवाई केवल दिखावा होती थी। बाशू का बचपन बेहद गरीबी में बीता। वह किशोरावस्था में ही मुंबई आ गया था और जीविका के लिए छोटे-मोटे काम करता था। एक बार चोरी के आरोप में उसे रिमांड होम भेजा गया, जहां उसने कड़ी मेहनत के जरिए अपने शरीर को मजबूत बनाया। वहीं से उसके जीवन की दिशा बदल गई। रिहा होने के बाद उसने अपराध की दुनिया में कदम रखा और धीरे-धीरे तस्करी के धंधे में बड़ा नाम बन गया।
उसने अपनी एक टीम बनाई, जो डॉक से निकलने वाले माल से चोरी करती थी। बाद में उसने विदेशी घड़ियों और अन्य सामान की तस्करी शुरू की, जिससे उसे भारी मुनाफा हुआ। कुछ ही समय में वह मुंबई के बड़े तस्करों की श्रेणी में शामिल हो गया। बाशू दादा की खासियत यह थी कि वह अपने दम पर आगे बढ़ा था और दूसरों पर निर्भर रहना पसंद नहीं करता था। उसे अपने शरीर और ताकत पर गर्व था और वह हमेशा अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन करता रहता था। कुल मिलाकर, बाशू दादा की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसने गरीबी और संघर्ष से निकलकर अपराध की दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा किया, लेकिन उसकी यह शक्ति और प्रतिष्ठा समाज के लिए हमेशा एक चुनौती बनी रही।

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