मुख्यपृष्ठधर्म विशेषचीन, जापान, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया में विनायक की परंपरा

चीन, जापान, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया में विनायक की परंपरा

विनायक पूजन अब केवल हिंदुस्थान तक सीमित नहीं है। नेपाल, मध्य एशिया, चीन, जापान, अमेरिका, इंग्लैंड और मैक्सिको सहित अनेक देशों में भी गणेश पूजा व्यापक रूप से की जा रही है। मैक्सिको में एक पुरातात्विक खुदाई के दौरान गणेश और लक्ष्मी की मूर्तियां मिलने का उल्लेख किया जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में गणेश आराधना का प्रभाव दूर-दूर तक पहुंचा था। इसके अतिरिक्त कंबोडिया, बर्मा (म्यांमार), मलेशिया, थाईलैंड, जावा, सुमात्रा और तिब्बत जैसे क्षेत्रों में भी गणेश पूजा के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

ऐसा भी कहा जाता है कि अमेरिका की खोज करने वाले कोलंबस से पूर्व वहां सूर्य, चंद्र और गणेश की प्रतिमाएं पहुंच चुकी थीं। विश्व के कई देशों में खुदाई के दौरान हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं और उनमें गणेश की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय बताई जाती है। इन प्रतिमाओं को हजारों वर्ष पुराना माना गया है।

पश्चिम में रोमन देवता ‘जेनस’ की तुलना गणपति से की गई है। माना जाता है कि प्राचीन रोमन और इतालवी लोग अपने इष्ट देव जेनस की पूजा करते थे। अठारहवीं शताब्दी के संस्कृत विद्वान विलियम जोन्स ने जेनस और गणेश की तुलना करते हुए कुछ समानताओं की ओर संकेत किया था। रोमन और संस्कृत शब्दों के उच्चारण में भी आंशिक समानता देखी जाती है, जैसे जेनस और गणेश।

‘गणेश: ए मोनोग्राफ ऑफ द एलीफेंट फेल्ड गॉड’ नामक ग्रंथ में उल्लेख है कि विश्व के विभिन्न देशों में गणेश की प्रतिमाएं प्राचीन काल से स्थापित रही हैं और विदेशों में पाए जाने वाले विनायक के स्वरूपों में विविधता दिखाई देती है। जावा में गणेश की मूर्तियों में उन्हें पालथी मारकर बैठे हुए दर्शाया गया है, जिनके दोनों पैर भूमि पर टिके हैं और तलवे आपस में सटे हुए हैं। भारत में प्रचलित गणेश प्रतिमाओं में सूंड प्रायः दाईं या बाईं ओर मुड़ी हुई होती है, जबकि कुछ विदेशी प्रतिमाओं में सूंड सीधी अथवा सिरे से मुड़ी हुई दिखाई देती है। जापान में गणेश को ‘कांगितेन’ नाम से जाना जाता है, और वहां की प्रतिमाओं में उन्हें दो या चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है।

सन् 804 ईस्वी में जापान के भिक्षु कोबो दाइशी धर्म अध्ययन के लिए चीन गए। वहां उन्हें वज्रबोधि और अमोघवज्र जैसे भारतीय आचार्यों द्वारा अनूदित ग्रंथों का अध्ययन करने का अवसर मिला। चीन की मंत्र परंपरा में भी गणेश का उल्लेख मिलता है। सन् 720 ईस्वी के आसपास अमोघवज्र, जो भारतीय मूल के ब्राह्मण माने जाते हैं, चीन की राजधानी लोयांग पहुंचे और उन्हें कुआंग फू मंदिर में आचार्य के रूप में प्रतिष्ठा मिली। उनके शिष्य हुई-कुओ ने दीक्षा प्राप्त की और बाद में कोबो दाइशी को भी दीक्षित किया। कोबो दाइशी ने विभिन्न मठों से संस्कृत पांडुलिपियां एकत्र कीं और सन् 806 में जापान लौटते समय वज्रधातु से संबंधित सूत्रों के साथ गणेश के चित्र भी साथ ले गए, जिन्हें समृद्धि का प्रतीक माना गया।

जापान के कोयासन स्थित सन्तसुजी विहार में गणेश की चार प्रमुख चित्रावलियां संरक्षित हैं, जिनमें युग्म गणेश, षड्भुज गणेश, चतुर्भुज गणेश और सुवर्ण गणेश उल्लेखनीय हैं। तिब्बत के अनेक मठों में भी गणेश पूजन की परंपरा प्राचीन है, जहां उन्हें अधीक्षक या संरक्षक देवता के रूप में सम्मानित किया जाता है।

नौवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों में गणेश आराधना का प्रचलन आरंभ हो चुका था। चीन के तुनहुआंग क्षेत्र में एक पहाड़ी पर सन् 644 ईस्वी में गणेश प्रतिमाएं स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। एक मूर्ति के आधार पर चीनी भाषा में यह अंकित है कि वे हाथियों के अमानुष राजा हैं। चीन में गणपति को कांतिगेन भी कहा जाता है।

कंबोडिया की प्राचीन राजधानी अंगकोर में प्राप्त मूर्तियों के विशाल भंडार में भी गणेश के विविध स्वरूप पाए गए हैं। श्याम देश (वर्तमान थाईलैंड) में बसे भारतीयों द्वारा वैदिक धर्म के प्रचार के परिणामस्वरूप वहां गणेश पूजा का विकास हुआ और वहां निर्मित गणेश प्रतिमाएं ‘आयुथियन’ शैली में दिखाई देती हैं। इस प्रकार विभिन्न देशों में उपलब्ध प्रमाण यह दर्शाते हैं कि गणेश पूजा ने सीमाओं को लांघते हुए विश्व संस्कृति में अपना विशिष्ट स्थान बनाया।

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