भूख हर एक शाम तक पहुंची,
पर न रोटी ही थाल तक पहुंची।
सिंहासन चढ़ते रहे चेहरे सब,
भूख क्यों नीलाम तक पहुंची।
आज रोटियों पर पहरे बैठे,
नीति केवल निजाम तक पहुंची।
जंगल उगते रहे विकासों के,
आग हर एक मकान तक पहुंची।
रोशनी बांटी गई कागज पर,
रात फिर हर धाम तक पहुंची।
शहर चमके तो गांव बुझते हैं,
धूल ही खेत-खलिहान तक पहुंची।
विस्थापित हैं कई जिंदगियां,
कब दिलासा मकान तक पहुंची।
संतोषों का पाठ पढ़ाया गया,
दौलत केवल सलाम तक पहुंची।
अमन की बातें बहुत हुईं लेकिन,
जंग हर एक शाम तक पहुंची।
अब सवालों का वक्त आ पहुंचा,
चुप्पियाँ कब कलाम तक पहुंची।
हक़ की आवाज उठेगी जब-जब,
सत्ता कांपे निजाम तक पहुंची।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
