मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाहां, मुझे डर लगता है!

हां, मुझे डर लगता है!

हां, मुझे डर लगता है,
दिल के अचानक टूट जाने से,
हमसफर का साथ छूट जाने से,
अपनों के रूठ जाने से।
हां, मुझे डर लगता है,
उदास सूनी आंखों से,
रुक रुककर आती-जाती सांसों से,
खुद से बात करती लाशों से।
हां, मुझे डर लगता है,
अनजान रास्तों पर खोने से,
मां के सामने खुलकर रोने से,
उसकी यादों के साथ होने से।
हां, मुझे डर लगता है,
हंसकर किये गये वादों से,
हरपल पीछा करती यादों से,
बहुत खुशी देने वाली बातों से।
हां, मुझे डर लगता है,
कच्ची दीवारों के दरकने से,
किसी मासूम के सिसकने से,
भरोसे की जमीन खिसकने से।
-बृज लाल तिवारी
पथवलिया, गोंडा (उ.प्र.)

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