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निवेश गुरु : जल में निवेश या संकट में निवेश?.. मारवाड़ के भविष्य का असली फंड

भरतकुमार सोलंकी
मुंबई

जरा सोचिए—यदि इस वर्ष बारिश न हो और धीरे-धीरे मुंबई, पुणे, नागपुर, इंदौर और जयपुर जैसे बड़े शहरों को जल आपूर्ति करने वाले बांध सूख जाएं, तो क्या होगा? क्या महानगरों की चकाचौंध बरकरार रह पाएगी, या लोग अपने घर-परिवार छोड़कर पानी की तलाश में गांवों की ओर लौटने को मजबूर होंगे? और यदि ऐसा हुआ, तो क्या गांव इस अचानक बढ़े दबाव को संभाल पाएंगे? दूसरी ओर, क्या यह भी सच नहीं कि गांवों में रहने वाले लोग पहले से ही जल संकट के साथ जीने के आदी हो चुके हैं? दो-चार दिन नल में पानी नहीं आता, तो वे इसे समस्या नहीं, ‘दिनचर्या’ मानकर स्वीकार कर लेते हैं। क्या यही सोच धीरे-धीरे मारवाड़ जैसे क्षेत्रों को बंजर नहीं बना रही? क्या हम केवल पीने के पानी तक सीमित सोचकर सिंचाई जल की अनदेखी नहीं कर रहे? निवेश की भाषा में देखें तो किसी भी क्षेत्र का वास्तविक ‘रिटर्न’ उसकी आधारभूत संरचना (इंप्रâास्ट्रक्चर) पर निर्भर करता है। क्या जल संचयन से बड़ा कोई इंप्रâास्ट्रक्चर हो सकता है? जब जल नहीं, तो खेती नहीं; खेती नहीं, तो आय नहीं; आय नहीं, तो विकास नहीं—क्या यह सीधी आर्थिक श्रृंखला नहीं है? फिर सवाल उठता है—जब देश के अन्य हिस्सों में बांधों और जल प्रबंधन पर निवेश ने आर्थिक क्रांति लाई, तो मारवाड़ क्यों पीछे रह गया? क्या कारण है कि हम आज भी वर्षा पर निर्भर हैं, जबकि समाधान हमारे सामने मौजूद है?
इसी संदर्भ में जवाई बांध एक उदाहरण है, जिसने क्षेत्र को जीवन दिया। तो क्या अरावली पर्वतमाला में जवाई से भी बड़े पांच नए पक्के बांध बनाकर मारवाड़ की तस्वीर बदली नहीं जा सकती? क्या यह निवेश भविष्य में कृषि, उद्योग और रोजगार के रूप में कई गुना ‘रिटर्न’ नहीं देगा? और इसी श्रृंखला में कांकलावास बांध का अधूरा पड़ा कार्य क्या एक ‘डेड इंवेस्टमेंट’ बनकर नहीं रह गया है? यदि १९६४–१९७४ के बीच शुरू हुई इस परियोजना को आज पुनर्जीवित किया जाए, तो क्या यह क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा ‘रिवाइवल प्रोजेक्ट’ नहीं बन सकता?
यही सोच लेकर मारवाड़ के ग्रामीणों ने ‘कांकलावास बांध निर्माण परियोजना – पब्लिक सिग्नेचर वैंâपेन’ शुरू किया है। लेकिन क्या यह केवल ग्रामीणों की जिम्मेदारी है? क्या चेन्नई या मुंबई में बसे मारवाड़ी समाज का इससे कोई सरोकार नहीं? क्या हम यह भूल जाएं कि हमारी जड़ें उसी मारवाड़ की मिट्टी में हैं, जिसकी प्यास आज भी बुझनी बाकी है?
यदि निवेश का अर्थ केवल धन लगाना है, तो शायद हर कोई सक्षम न हो। लेकिन यदि निवेश का अर्थ ‘संकल्प’ है, तो क्या एक हस्ताक्षर भी निवेश नहीं है? क्या यह एक सिग्नेचर सरकार को यह संदेश नहीं देता कि यह केवल मांग नहीं, बल्कि सामूहिक जनभावना है? अंतत: सवाल यही है-क्या हम संकट का इंतजार करेंगे या समय रहते जल में निवेश करेंगे? क्योंकि इतिहास गवाह है, जिसने जल को संभाला, उसी ने भविष्य को संवारा। तो क्या आप अपने हिस्से का निवेश-एक सिग्नेचर—करने के लिए तैयार हैं?
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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