मुख्यपृष्ठखबरेंरुख-ए-सियासत : होर्मुज का संकट...खाद, किसान और हमारी थाली

रुख-ए-सियासत : होर्मुज का संकट…खाद, किसान और हमारी थाली

तौसीफ कुरैशी

दोस्तों, अगर आपको लगता है कि होर्मुज का बंद होना सिर्फ तेल और गैस का मामला है तो शायद हम सबने बहुत संकीर्ण चश्मा लगा रखा है। वह २३ किलोमीटर चौड़ा जलडमरूमध्य सिर्फ ऊर्जा का नहीं, बल्कि खाद, केमिकल्स, अनाज और मशीनरी का भी महत्वपूर्ण रास्ता है। कल ही खबर आई कि ईरान ने वहां माइंस बिछा दिए। कुछ दिखते हैं, कुछ समुद्र की तलहटी में छिपे। जहाज गुजरेगा तो डूब जाएगा। बीमा भी नहीं मिलता, क्योंकि युद्ध के इन ३१ कारणों में कोई लागू नहीं होता। नतीजा सामने है। खाद के दाम ४७० डॉलर प्रति टन से बढ़कर ५८४ डॉलर हो गए २९ प्रतिशत की छलांग। एक क्विंटल की बोरी किसान को अब ५,३७२ रुपए की पड़ेगी। रबी का मौसम है। गेहूं बोने का समय। भारत अपनी खाद का करीब ४० प्रतिशत हिस्सा मध्य-पूर्व से मंगवाता है। जहाज रुके तो किसान कहां से लाएगा? थाली में अनाज वैâसे आएगा? मान लीजिए युद्ध इसी हफ्ते थम गया। फिर भी ईरान को उन बारूदी सुरंगों को हटाने में तीन महीने लगेंगे। तब तक बारिश आ जाएगी। किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा होगा, पुलिस की लाठी खाएगा। हम घर बैठे रोटी का इंतजार करेंगे और रोटी में अपनों की मेहनत का दर्द दिखने लगेगा।
यह संकट हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र की सुरक्षा सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि खेतों और थालियों में भी होती है। राजनीतिक दृष्टि अगर केवल तेल-गैस तक सीमित रही, तो देश कमजोर पड़ता है। हिंदू-मुसलमान की बहस से आगे उठकर हमें आत्मनिर्भरता। जैसे खाद उत्पादन बढ़ाना, वैकल्पिक रास्ते तलाशना, किसान की चिंता को राष्ट्रीय चिंता बनाने के बारे में सोचना चाहिए। पत्रकारिता ांदेशा दिलाती है, न कि घृणा। आज वही अंदेशा है। सोचिए, देर किस बात की? खाद का संकट हमारी एकता और दूरदर्शिता की परीक्षा है। किसान बचें तो राष्ट्र बचेगा।
सत्यमेव जयते

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