लोकमित्र गौतम
गुजरे १७ मार्च २०२६ को देश की सर्वोच्च अदालत ने गोद लिए बच्चे के लिए १२ हफ्ते की छुट्टी का पैâसला सुनाकर हाल में सुनाए गए अपने ऐतिहासिक पैâसलों की फेहरिस्त में एक और पैâसला जोड़ा। भारत में अब तक मातृत्व की परिभाषा में सिर्फ जन्म देनेवाली मां को ही देखा जाता था। लेकिन बदलते सामाजिक ढांचे और पारिवारिक संरचनाओं के बीच न्यायपालिका ने गोद लिए बच्चे के लिए भी १२ सप्ताह के मातृत्व अवकाश का निर्णय सुनाकर, मातृत्व की परिभाषा में व्यापक और ऐतिहासिक विस्तार किया है।
कोई भेदभाव नहीं!
इस पैâसले के बाद सामाजिक ढांचे और पारिवारिक संरचनाओं के बीच मां का अस्तित्व सिर्फ जन्म देने वाली मां तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उस मां को भी वही महत्व दिया जाएगा, जिसने किसी और के जन्म दिए गए बच्चे को अपने बच्चे के रूप में पालती है। कहने का मतलब गोद लिए बच्चे को भी अब महिला के वास्तविक बच्चे जैसा ही माना जाएगा।
गौरतलब है कि अभी तक तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश की व्यवस्था थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुजरे मंगलवार यानी १७ मार्च २०२६ को इस नियम को अमान्य करते हुए कहा, ‘अब किसी भी उम्र के बच्चे को गोद लेनेवाली महिला को १२ हफ्ते की मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश मिलेगा।’ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने सोशल सिक्युरिटी कोड-२०२० से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए धारा ६० (४) को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को ही गोद लिए जाने पर मातृत्व अवकाश की व्यवस्था थी। गौरतलब है कि २१ नवंबर २०२५ को केंद्र सरकार ने जो सामाजिक सुरक्षा संहिता-२०२० लागू की थी, इसमें उसी पुराने नियम को बरकरार रखा गया था, जो तीन महीने से कम उम्र के बच्चे पर ही मातृत्व अवकाश को मान्यता देता है। इस व्यवस्था को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘गोद लेनेवाली मां के लिए तीन महीने की उम्र की शर्त न सिर्फ गलत और भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद १४ (समानता के अधिकार) का उल्लघन है।’
साल २०१७ में हमसानंदनी नंदूरी ने दो बच्चों को गोद लिया था। साढ़े चार साल की एक लड़की और दो साल के एक लड़के को। लेकिन जब बच्चों को गोद लेने के बाद उसने अपने दफ्तर से मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश की मांग की तो उसे सिर्फ छह-छह हफ्ते की छुट्टी दी गई, क्योंकि गोद लिए गए ये बच्चे तीन महीने से बड़े थे। नंदूरी ने इस व्यवस्था के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि तीन महीने की उम्र की शर्त न केवल भेदभावपूर्ण बल्कि संवैधानिक रूप से भी गलत है, क्योंकि इससे समानता के अधिकार का हनन होता है। २९ जनवरी २०२५ को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पैâसला सुरक्षित रख लिया और १७ मार्च २०२६ को तीन महीने की आयु सीमा वाले प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी उम्र के बच्चे को गोद लेनेवाली मां को मातृत्व अवकाश दिया जाएगा। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मातृत्व अवकाश के साथ-साथ पितृत्व अवकाश को भी महत्वपूर्ण और जरूरी बताया।
बॉन्डिग पीरियड की अहमियत
मालूम हो कि भारत में अभी तक पितृत्व अवकाश को कानूनी मान्यता हासिल नहीं है, जबकि महिलाओं को मैटरनिटी लीव मिलती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पितृत्व अवकाश को भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे लाया जाना चाहिए और इसके लिए केंद्र सरकार कानून बनाए। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, इस कानून में छुट्टी की अवधि माता-पिता और बच्चे की जरूरत के अनुसार तय होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश को भी अपने पैâसले में इसलिए शामिल किया, क्योंकि उसका मानना है कि बच्चे के शुरुआती विकास में मां और पिता दोनों की ही प्रमुख भूमिका होती हैं। नि:संदेह यह पैâसला कई वजहों से ऐतिहासिक है। सबसे पहले तो यह पैâसला अब तक बच्चा जन्म देनेवाली मां और बच्चा गोद लेनेवाली मां के बीच जो भेदभाव मौजूद था, उसे यह पैâसला खत्म करता है। उसके बाद नये जमाने की जरूरतों के हिसाब से परवरिश को देखने की कोशिश करता है, क्योंकि अब वह जमाना नहीं रहा, जब बच्चे को केवल मां ही पालती है। आजकल बच्चे के लालन-पालन में मां और बाप दोनों की बराबर की भूमिकाएं होती हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह पितृत्व अवकाश की भी व्यवस्था करे। हालांकि, पितृत्व अवकाश कितने दिनों का हो, यह बात सुप्रीम कोर्ट ने नहीं तय की और कहा है कि माता-पिता और बच्चे की जरूरतों के हिसाब से इसे तय किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक पैâसला ऐसे समय पर आया है, जब एक ओर भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम १९६१ के तहत जैविक माताओं को २६ सप्ताह की छुट्टी मिलती है, वहीं गोद लेनेवाली माताओं के लिए यह अवकाश की व्यवस्था न सिर्फ सीमित बल्कि काफी हद तक अस्पष्ट थी। इस निर्णय के बाद अब जैविक और गोद लेनेवाली माताओं के बीच का फासला खत्म हो गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मातृत्व केवल जैविक भाव नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। ऐसे में शुरुआती समय में बच्चे के साथ माता-पिता विशेषकर मां की उपस्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे बॉन्डिंग पीरियड माना है और इसकी अहमियत को रेखांकित करते हुए पैâसला दिया है कि गोद लिया गया बच्चा चाहे छोटा हो या बड़ा, उसकी भावनात्मक और विकासकात्मक जरूरतें एक जैसी होती हैं। इस पैâसले में सुप्रीम कोर्ट की यह मान्यता एक नया सामाजिक संकेत दे रही है, क्योंकि भारत में परिवार की अवधारणा तेजी से बदल रही है। न केवल सिंगल पैरेंट्स, लेट मैरिज बल्कि बच्चे को गोद लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है।
ऐसे में यह निर्णय इन सभी सामाजिक रूपों को वैधता प्रदान करने के साथ-साथ सम्मान भी प्रदान करता है। साथ ही उन हजारों दंपत्तियों और एकल व्यक्तियों को भी बच्चे को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो किसी कारणवश जैविक रूप से मां या पिता नहीं बन सकते। मगर बच्चों को अपनाने की इच्छा रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस पैâसले में एक अप्रत्यक्ष रूप से यह इशारा भी छिपा है कि देश में बढ़ती जनसंख्या को काबू करने के लिए बच्चा पैदा करने के बजाय गोद लेने को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भले इस लक्ष्य को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त न किया गया हो, लेकिन ‘एकल पैरेंटिंग राइट्स’ के इस कदम से जैविक बच्चे की ही तरह गोद लेने वाले बच्चे के प्रति भावना मजबूत होगी।
कुल मिलाकर अगर सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक पैâसले को डिकोड करें तो पता चलता है कि यह सिर्फ गोद लिए गए किसी भी उम्र के बच्चे के लिए समान मातृत्व अवकाश की बात भर नहीं है, बल्कि इससे आगे मां की परिभाषा को जैविक से आगे ले जाकर सामाजिक और भावनात्मक बनाने की प्रक्रिया भी है। पहली बार सुप्रीम कोर्ट जैसी किसी न्यायिक संस्था ने बच्चे के शुरुआती समय को, भावनात्मक जुड़ाव को, परवरिश के लिए न केवल महत्वपूर्ण माना है बल्कि उसे कानूनी आधार भी दिया है। इससे कार्यस्थलों को अधिक समावेशी बनाया जा सकेगा और भविष्य में जेंडर-न्यूट्रल पैरेंटिंग की नींव मजबूत होगी।
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)
