मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : शर्म उनको भी आती है कभी-कभी

तरकश : शर्म उनको भी आती है कभी-कभी

धनुर्धर

पद्म श्री कंगना रनावत आम तौर पर बड़ी सहज रहती हैं। वह सारे काम सहजता से ही करती हैं। फिल्मी पर्दे पर उनके सहज अभिनय का कमाल तो सबने देखा, लेकिन वह सिर्फ शुरुआत थी। उसके बाद उन्होंने स्क्रिप्ट राइटिंग से लेकर फिल्म निर्देशन और अपनी फिल्मों की समीक्षा तक-सारे काम सहजता से अपने हाथ में ले लिए। गड़बड़ यह हुई कि दर्शकों की भूमिका में नहीं आ सकीं और दर्शक उतनी सहजता से उनके लेखन और निर्देशन का लुत्फ नहीं उठा सके। कुछ ने तो यहां तक कह दिया कि जब स्क्रिप्ट और डायरेक्शन में दम नहीं तो एक्टिंग क्या खाक दिखेगी। यह पूरी ‘सहजता’ से कंगना जी की समस्त फिल्मी प्रतिभा पर पानी फेरनेवाली बात थी।
लेकिन चिंता नहीं। कंगना जी में गैर-फिल्मी प्रतिभा की भी कोई कमी थोड़े ही थी। भांति-भांति के विवाद खड़े करके वह उतनी ही सहजता से न केवल लाइमलाइट में बनी रहीं बल्कि लाइमलाइट को एक इंच भी इधर-उधर सरकने की इजाजत दिए बगैर लोकसभा तक पहुंच गर्इं।
ऐसी कंगना जी जब कहती हैं कि नेता प्रतिपक्ष की लोकसभा में मौजूदगी उन्हें असहज करती है तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। वैसे तो राहुल गांधी की संसद में मौजूदगी से खुद मोदी जी भी असहज होने लगे हैं। जब से मुआ एप्सटीन उनकी जबान पर आ गया है, तब से मामला ज्यादा संगीन हो गया है। हालांकि, सच यह है कि उनकी जबान पहले से ही बिगड़ी हुई है। जब एपस्टीन नहीं था, तब भी राफेल और पेगासस से लेकर दानी अदानी तक वही-वही मुद्दे उनकी जबान पर आते, जिनसे मोदी जी के मुंह का जायका बिगड़ जाता है। ऐसा लगता है पीएम के मुंह पर दो पल की भी मुस्कुराहट इन्हें बर्दाश्त नहीं होती। जैसे ही मौका मिलता है, कुछ ऐसा बोल जाते हैं कि मोदी जी जल-भुन उठें।
इसीलिए पिछली बार राहुल गांधी की संसद की सदस्यता ही ले ली गई कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। न-न सुषमा जी की बांसुरी से कोई दिक्कत नहीं है। मसला तो एलओपी के गले की फटे बांस जैसी आवाज का है। उसी आवाज को दूर करने के लिए उन्हें संसद से दूर किया गया कि सारा कलेश ही मिट जाए हमेशा के लिए, लेकिन वह फिर आ गए संसद में। नई लोकसभा में तो एलओपी का पद भी हथिया लिया। अब उनका माइक बंद करना भी आसान नहीं रहा। सदन में उनका बोलना रुकवाने के लिए पूरे विपक्ष को बाहर करना पड़ता है। तुर्रा यह कि बाहर जाकर वे और जोर से चीखने लगते हैं।
मोदी जी की असहजता देखकर शाह जी से लेकर रिजिजू जी तक सब बेचैन हो जाते हैं। लेकिन इन सबकी बेचैनियां एक तरफ और कंगना जी की असहजता एक तरफ। जो कंगना जी अपने बयानों से पूरे देश को असहज करती रही हैं, कोई उन्हें असहज कर दे, यह बात देशवासी सहजता से भला वैâसे देख सकते हैं। वे सब इस पर उत्साहित हो गए हैं। सुना है, ऐसे तमाम लोग नेता प्रतिपक्ष का अभिनंदन करनेवाले हैं और उनसे यह राज पूछनेवाले हैं कि जिन कंगना जी को असहज करने की कोशिश में फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बड़े करन-धार भी मुंह के बल गिरे नजर आए, उन्हें इतनी आसानी से ‘अनकंफर्टेबल’ वैâसे कर दिया। आखिर उनकी चाय-बिस्किट में ऐसा क्या है कि जो सांसद अमेरिका वाली उस खास ‘फाइल’ पर भी नजरें नहीं झुकातीं, तेल-खरीदी के नए-नए ट्रंपी फरमानों से शर्मिंदा नहीं होतीं, गृहमंत्री महोदय की असंसदीय भाषा से लज्जित नहीं महसूस करतीं, वे एलओपी के आचरण पर शर्मिंदा हैं। वैसे इस प्रकरण से, कम से कम यह तो साफ हो गया कि आदरणीया कंगना जी को शर्म भी आती है। वरना कई लोग तो मान बैठे थे कि उनकी निर्लज्जता की कोई सीमा ही नहीं।

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