मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाजो घरौंदों में पंछी थके हारे थे

जो घरौंदों में पंछी थके हारे थे

गमजदा दिल रहा दिल लगाने के बाद,
आंख नम ही रही मुस्कुराने के बाद।
फूंकना है तेरी याद को आग में,
तय किया ये मगर दिल जलाने के बाद।
बिन-हवा बिन-परों के उड़ी अर्श पर,
पर्दा शर्म-ओ-हया का हटाने के बाद।
सोते-सोते कई ख्वाब देखे मगर,
इक न पूरा हुआ जाग जाने के बाद।
जो घरौंदों में पंछी थके हारे थे
उड़ गए वो शजर को हिलाने के बाद
पांव से मेरे किसने जमीं खींच ली
दो कदम जो चली डगमगाने के बाद
जिंदगी की थकन औढ़ लेना ‘कनक’,
मौत की गोद में लेट जाने के बाद।
-डॉ. कनक लता तिवारी

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