सूरज सिंह
ऐशट्रे में एक सिगरेट आधी जली हुई पड़ी थी। वहीं एक पेन रखा था, जिससे अभी-अभी कागज पर कुछ लिखा गया था। मुलायम चमड़े की कुर्सी पर बना बैठने का निशान अब धीरे-धीरे मिट रहा था और सीट अपनी मूल अवस्था में लौट रही थी। खिड़की खुली थी और उससे आती हल्की हवा के कारण परदे लहरा रहे थे। कमरे की हर चीज किसी के हाल ही में वहां मौजूद होने का संकेत दे रही थी, लेकिन वह व्यक्ति स्वयं वहां दिखाई नहीं दे रहा था।
तंबाकू की तेज गंध और धुआं अब भी हवा में तैर रहा था। एयर कंडीशनर पूरी क्षमता से चल रहा था। ‘पाको रबाने’ इत्र की खुशबू अब भी महसूस हो रही थी—इसका मतलब साफ था कि यहां से अभी-अभी दाऊद निकला था।
सन् १९८६ में किसी समय क्राइम ब्रांच के कुछ अधिकारियों ने मुसाफिरखाना इलाके में दाऊद के ठिकाने पर आधी रात से पहले छापा मारा था। दो मंजिला जर्जर इमारत में असामान्य सन्नाटा देखकर अधिकारी चौंक गए। यही वह जगह थी, जहां से अपराधों का संचालन होता था और जहां हर समय चहल-पहल रहती थी—यहां तक कि भोर से पहले भी। खासकर भूतल पर, जहां दाऊद का आलीशान ऑफिस था, हमेशा गतिविधि रहती थी।
लेकिन उस दिन वहां कोई नहीं था। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर के गेट पर हथियारबंद गार्ड तैनात थे, जबकि पुलिस अधिकारी अंदर हर कमरे की तलाशी ले रहे थे। कुछ लोगों की नींद टूट गई थी तो कुछ को अपने निजी पलों को अचानक रोकना पड़ा।
दाऊद हमेशा यह सुनिश्चित करता था कि उसके सहयोगी उसके नियंत्रण में रहें। बड़े-बड़े गैंगस्टरों को भी वह उनकी औकात दिखा देता था। वह पुलिस से भी अधिक चालाक साबित हुआ। शुरुआत में पुलिस ने उसे मुखबिर की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन धीरे-धीरे वही दाऊद उनके खिलाफ खड़ा हो गया और उसके भीतर बदले की भावना लगातार बढ़ती गई।
मुंबई से लेकर दमन तक इलेक्ट्रॉनिक सामान से लेकर सोना-चांदी तक की तस्करी में उसका दबदबा था। पहले गुजरात में पठान गिरोहों का इस धंधे पर कब्जा था, लेकिन दाऊद ने धीरे-धीरे यह नियंत्रण उनसे छीन लिया। इसमें कुछ हद तक पुलिस की भूमिका भी रही।
१९८२ में दाऊद को कस्टम्स के विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले १९७७ में उसे लूट के आरोप में पकड़ा गया था, तब उसे एक छोटे-मोटे अपराधी की तरह देखा जाता था। पुलिस उसे कई बार क्राइम ब्रांच में बुलाकर लॉकअप में डाल चुकी थी, लेकिन साबिर की हत्या के बाद उसका अपराध साम्राज्य तेजी से बढ़ने लगा। इसके बाद पुलिस भी उसकी गिरफ्तारी के मामले में सतर्क हो गई।
१९८३ में उसके खिलाफ सभी आरोप हटा दिए गए। उसका गैंग मुंबई का सबसे ताकतवर बन चुका था और खुलेआम हिंसा होने लगी थी। दाऊद अब शहर में दंगे और अशांति पैâलाने में माहिर हो गया था। समद खान की हत्या के बाद वह पुलिस की ‘वॉन्टेड’ सूची में सबसे ऊपर पहुंच गया। हालांकि, उसके खिलाफ पहले से मामलों में जमानत नहीं थी, फिर भी वह गिरफ्तारी से बच निकला और फरार हो गया।
उसे पहले ही खबर मिल चुकी थी कि पुलिस उसे गिरफ्तार करने वाली है। पुलिस उसके ऑफिस पहुंचती, उससे कुछ मिनट पहले ही वह वहां से निकल चुका था। जब पुलिस को बताया गया कि वह उनके जाल से निकलकर विमान से फरार हो गया है तो वे हैरान रह गए। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि दाऊद ने पुलिस तंत्र में ही अपने मुखबिरों का इतना मजबूत जाल बिछा रखा था।
एक दिन पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में उच्चस्तरीय बैठक हुई, जिसमें यह सवाल उठा कि दाऊद को गिरफ्तारी की भनक वैâसे लगी। जांच में सामने आया कि पुलिस की योजना की जानकारी फोन पर साझा की गई थी और वहीं से सूचना लीक हुई।
संभावना यह भी जताई गई कि पुलिस कमिश्नर द्वारा एक वरिष्ठ राजनेता से सलाह लेने के दौरान यह सूचना बाहर चली गई। उस राजनेता ने निर्देश दिया था कि किसी भी कीमत पर दाऊद को जिंदा पकड़ा जाए। यहीं से सूचना लीक होने की आशंका बनी।
एक अधिकारी ने बताया, ‘हमारी जानकारी के अनुसार दाऊद एयरपोर्ट पहुंचा और दुबई जाने वाली फ्लाइट में सवार हो गया।’ ‘लेकिन उसका पासपोर्ट तो हमने जब्त कर लिया था,’ सोमण ने आश्चर्य से कहा। ‘सर, उसका पासपोर्ट अभी भी क्राइम ब्रांच के पास सुरक्षित है, ’भट्ट ने जवाब दिया।
दरअसल, दाऊद ने मुंबई से दिल्ली तक घरेलू उड़ान ली और वहां से दुबई के लिए अंतर्राष्ट्रीय फ्लाइट पकड़ी। उसने दूसरा पासपोर्ट बनवा रखा था और उसी का इस्तेमाल कर वह फरार हो गया।
