-१० में से ६ को है समस्या…बदलते हार्मोन और वजन हैं बड़ा कारण
सामना संवाददाता / मुंबई
बीते कुछ वर्षों से नई माताओं की रीढ़ पर संकट मंडराने लगा है। करीब ६० फीसदी माताएं प्रसव के बाद पीठ दर्द की महामारी झेल रही हैं। आलम यह है कि हर महीने २५ से ३० साल की उम्र की १० में से ६ नई माताएं प्रसव के बाद पीठ दर्द की समस्या लेकर आती हैं। बदलते हार्मोन, वजन में अचानक वृद्धि और बदलते पोश्चर रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। इसके अलावा लगातार बैठी जीवनशैली, लंबे स्क्रीन टाइम और गलत बैठने की आदतें इस समस्या को और बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर सही देखभाल और फिजियोथेरपी से इस पीठ दर्द को रोका जा सकता है और नई माताएं अपनी दिनचर्या सामान्य रूप से जारी रख सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि रीढ़ की हड्डी पर संकट का सायरन बज चुका है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। हर महीने २५ से ३० साल की उम्र की १० में से ६ गर्भवती महिलाएं प्रसव के बाद पीठ दर्द और रीढ़ की समस्याओं के कारण अस्पतालों का रुख कर रही हैं। वर्ल्ड स्पाइन डे के मौके पर डॉक्टरों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर लक्षणों को हल्के में लिया तो आनेवाले सालों में यह दर्द स्थायी विकलांगता में बदल सकता है। जायनोवा शाल्बी अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. विश्वनाथन अय्यर का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ना, हार्मोनल उथल-पुथल और बदलता पोश्चर रीढ़ पर सीधा दबाव डालता है। प्रसव के बाद बच्चे को गोद में उठाना, लंबे समय तक झुककर स्तनपान कराना और आराम की कमी, पीठ को स्थाई नुकसान की ओर धकेल रही है। यह सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि यह एक खतरे की घंटी है। डॉ. अय्यर ने नई माताओं को साफ चेताया कि बार-बार झुकने से बचें, सपोर्टिव कुर्सियों का प्रयोग करें, वजन नियंत्रित रखें और पर्याप्त आराम लें, वरना आगे चलकर डिस्क डैमेज और लंबी अवधि की अक्षमता का खतरा है।
टेक्स्ट नेक का फैल चुका है प्रकोप
अपोलो स्पेक्ट्रा अस्पताल के स्पाइन सर्जन डॉ. सिद्धार्थ कातकडे के अनुसार, रीढ़ का संकट अब बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। २५ से ४५ साल के युवाओं में पोश्चर डिस्टॉर्शन और असमय पीठ दर्द के मामले विस्फोटक दर से बढ़ रहे हैं। टेबल, लैपटॉप और मोबाइल पर घंटों झुककर बैठने से टेक्स्ट नेक का प्रकोप फैल चुका है। गर्दन पर खिंचाव, हाथ-पैरों में झनझनाहट, कमजोरी और मोटापा ये सभी मिलकर रीढ़ को तबाह कर रहे हैं।
साइलेंट किलर बनी बीमारी
४५ साल से कम उम्र के १० में से ६ लोगों को गर्दन की जकड़न और लचीलेपन में कमी की शिकायत होती है। लगातार मोबाइल और लैपटॉप का उपयोग, लंबे समय तक बैठना, हाथ-पैरों में झनझनाहट या कमजोरी और मोटापा ये सभी मुख्य कारण हैं। विशेषज्ञों ने साफ चेतावनी दी है कि रीढ़ की बीमारी अब नई माताओं और युवाओं के लिए ‘साइलेंट किलर’ बन चुकी है। इलाज में देरी का मतलब दर्द के साथ एक टूटा हुआ जीवन है।
