एड. राजीव मिश्र मुंबई
मास्टर साहब अपने जीवन के लगभग ५६ बसंत पार कइ चुके हैं। जब केउ पढ़य लिखय में जियादा ध्यान नहीं देत रहा तब मास्टर साहब कइसौ दसवीं पास होइ गए रहे। अब आजादी के बाद न तो इतनी जनसंख्या रही अउर न आरक्षण रहा। मास्टर साहब रामजी की कृपा से गांव के प्राथमिक स्कूल में शिक्षक होइ गए। पहिले स्कूल शिक्षा के मंदिर होत रहे अउर मास्टर ओहि मंदिर के देवता। धीरे-धीरे समय बदला… मास्टर साहब स्कूल में पढ़ाई कम गप्पेबाजी ज्यादा शुरू कइ दिहिन। धीरे-धीरे कुल लड़िका भकभकाइ के गांव के मांटेसरी स्कूल में भर्ती होइ गए। जवन लड़िका बचे भी हैं उहौ बस मिडडे मिल के लालच में पड़े हैं। मास्टर साहब के रिटायरमेंट में दुइ बरिस बचा है, लेकिन रिटायरमेंट अउर पेंशन के मजा लेवय के पहिले मास्टर साहब मृत्यु के प्राप्त होइ गए। मरे के बाद ऊपर पहुंचे तो चंद्रगुप्त मास्टर साहब के खाता बही लइके बइठा रहें। हिसाब-किताब लगावै के बाद चंद्रगुप्त मास्टर साहब के नरक के पास इशू कइके दिहे। नरक के पास देखतै मास्टर साहब भड़कि गए…ई तो सरासर अन्याय है, पक्षपात है। हमके हमरा पूरे जिनगी के बैलेंस शीट दिहा जाय। हमइ तुम्हरे हिसाब पर रत्तीउ भर बिस्वास नहीं है। तुम हिसाब-किताब में घालमेल करत हौ। हम यमराज से बात करबै। चंद्रगुप्त मास्टर साहब के लइके यमराज के पास पहुंचे। यमराज भी कागज पत्तर देखय के बाद मास्टर साहब से बोले हिसाब तो सहिये है जी। जब पूरी जिनगी तनख्वाह लइके स्कूल में बकलोली किहे हौ तो सरग कहां से मिली। ऐसा है यमराज ! ज्यादा हेडमास्टर फौजदार न बनो। जनगणना के करत हौ? मास्टर, वोटर लिस्ट कउन बनावत है? मास्टर, चुनाव के ड्यूटी कउन करत है? मास्टर, वोट के गिनत है? मास्टर, कउनउ महामारी होय गांव-गांव कउन भटकत है मास्टर, मनई छोड़व गोरु-बछरू तक गिनय बिना सरकार मास्टरन के लगाय दिहिस। अब तुम बताओ ई सब करे के बाद पढ़ावे बिना केतना टाइम बची। मास्टर साहब के दुख सुनत-सुनत यमराज के आंखिन से झरझर आस गिरय लागि। यमराज सिसकी लेत-लेत भोकार छोड़ि दिहिन और तुरन्ते मास्टर साहब के नरक के पास वैंâसिल कइके सरग के पास पकड़ाई के आपन आस पोछत अंदर चले गएं।
