एम एम एस
क्या कोई १५ साल की किशोरी दुनिया की दो सबसे बड़ी समस्याओं, प्लास्टिक प्रदूषण और महिलाओं की स्वास्थ्य असुरक्षा का समाधान एक साथ निकाल सकती है? नाइजीरिया की रहीमा औवल-पांती ने यह साबित कर दिखाया है कि हौसला बड़ा हो, तो उम्र मायने नहीं रखती।
रहीमा को जब पता चला कि सामान्य सैनिटरी पैड्स में ९० प्रतिशत तक प्लास्टिक होता है, जिसे सड़ने में सैकड़ों साल लग जाते हैं, तो उन्होंने केवल चिंता नहीं जताई। उन्होंने कदम आगे बढ़ाया। अपने आस-पास खेती से निकलने वाले कचरे जैसे कसावा के छिलके, केले के सूखे पत्ते और मकई के भूसे को मिलाकर उन्होंने PantiPads’ नाम से बायोडीग्रेडेबल (आसानी से गलने वाले) इको-फ्रेंडली सैनिटरी पैड्स बना डाले। रहीमा की यह कहानी हमें तीन बेहद जरूरी जीवन मंत्र सिखाती है।
बहाने नहीं, समाधान ढूंढें
जब पर्यावरण और समाज में कोई कमी दिखे, तो यह मत सोचिए कि ‘कोई और इसे ठीक करेगा।’ रहीमा कहती हैं, अगर कोई कुछ नहीं कर रहा, तो मैं तो कर सकती हूं। संसाधनों की कमी कोई बाधा नहीं: उन्होंने किसी आलीशान लैब का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्थानीय कृषि कचरे को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया।
बड़ा सोचें, बड़ी शुरुआत करें
उनकी इसी सोच की बदौलत उनके प्रोजेक्ट को २०२६ के प्रतिष्ठित वैश्विक ‘अर्थ प्राइज’ के लिए चुना गया। याद रखिए यह आर्टिकल केवल एक समाचार नहीं, हर उस इंसान के लिए एक सीख है जो अपनी उम्र, परिस्थितियों या संसाधनों को छोटी मानकर रुक जाता है।
रहीमा ने साबित कर दिया कि बदलाव की शुरुआत आपके दिमाग में आने वाले एक छोटे से विचार और उसे पूरा करने के पक्के इरादे से होती है। अपनी ताकत पहचानिए, क्योंकि दुनिया बदलने के लिए किसी सही उम्र या सही वक्त की नहीं, बल्कि सिर्फ एक सही कदम की जरूरत होती है।
