प्रो. डॉ. दयानंद तिवारी
हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जीवंतता और समय के साथ चलने की क्षमता रही है। उसने भक्ति आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक और ग्राम्य जीवन से लेकर महानगरीय संस्कृति तक हर युग की धड़कनों को शब्द दिए हैं। किंतु आज जब समाज अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, तब साहित्य के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह केवल परंपरागत विषयों तक सीमित रहे या नए और मुक्त विषयों को भी अपने सृजन का आधार बनाए? मेरा स्पष्ट मत है कि हिंदी साहित्य को अब उन विषयों की ओर बढ़ना होगा, जो आज के मनुष्य के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
आज का युग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति, जैव प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य, साइबर सुरक्षा, स्टार्टअप संस्कृति, एकल परिवार, वैश्विक प्रवासन और बदलते सामाजिक संबंधों का युग है। इन विषयों पर प्रतिदिन लाखों लोग चर्चा कर रहे हैं, किंतु हिंदी साहित्य में इनकी उपस्थिति अभी भी अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी ज्ञान और विचार के लिए अन्य भाषाओं अथवा डिजिटल मंचों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है।
हमें यह समझना होगा कि साहित्य केवल कल्पना का संसार नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी है। यदि समाज बदल रहा है तो साहित्य को भी अपनी विषयवस्तु का विस्तार करना होगा। कबीर ने अपने समय के धार्मिक आडंबरों पर प्रहार किया, प्रेमचंद ने किसानों और शोषित वर्ग की पीड़ा को स्वर दिया, महादेवी वर्मा ने नारी संवेदना को नई ऊंचाई दी और हरिशंकर परसाई ने सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य किया। इन सभी ने अपने समय के ‘मुक्त विषयों’ को अपनाया। इसलिए आज यदि कोई लेखक डिजिटल जीवन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बुजुर्गों के अकेलेपन, ऑनलाइन शिक्षा, पर्यावरण संकट या मानसिक अवसाद पर लिखता है, तो वह साहित्य की परंपरा से विचलित नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ा रहा होता है।
विशेष चिंता का विषय हिंदी का प्रकाशन जगत भी है। आज भी अधिकांश प्रकाशन कविता, कहानी और उपन्यास पर केंद्रित हैं, जबकि विज्ञान, करियर, उद्यमिता, मनोविज्ञान, बच्चों के विकास, स्वास्थ्य, वित्तीय साक्षरता और समसामयिक ज्ञान पर गुणवत्तापूर्ण हिंदी पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। भारत में हिंदी भाषी पाठकों की विशाल आबादी होने के बावजूद उन्हें अपनी भाषा में अद्यतन और विश्वसनीय सामग्री सीमित मात्रा में मिलती है। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
नई पीढ़ी के पाठकों की रुचियां भी बदल चुकी हैं। वे ऐसे साहित्य की अपेक्षा रखते हैं जो केवल मनोरंजन न करे, बल्कि जीवन के प्रश्नों का समाधान भी प्रस्तुत करे। यदि कोई युवा करियर चुनना चाहता है, कोई अभिभावक बच्चों की डिजिटल आदतों को समझना चाहता है, कोई विद्यार्थी कृत्रिम बुद्धिमत्ता या जलवायु परिवर्तन पर सरल हिंदी में पढ़ना चाहता है, तो उसे गुणवत्तापूर्ण साहित्य सहज उपलब्ध होना चाहिए। यही साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
डिजिटल माध्यमों ने इस दिशा में नई संभावनाएं खोली हैं। ई-पुस्तकें, ऑडियोबुक, ब्लॉग, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया ने लेखकों को सीधे पाठकों तक पहुंचने का अवसर दिया है। अब किसी विचार के प्रसार के लिए केवल मुद्रित पुस्तक ही एकमात्र माध्यम नहीं रही। इसलिए लेखकों को भाषा में सरलता, तथ्यों में विश्वसनीयता और प्रस्तुति में आधुनिकता लानी होगी। तकनीक को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयोगी मानना समय की मांग है।
मुक्त विषयों का अर्थ यह भी है कि साहित्य जीवन के उन पहलुओं तक पहुंचे जिन पर लंबे समय तक खुलकर चर्चा नहीं हुई। मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, दिव्यांगजन, वृद्धावस्था, ग्रामीण नवाचार, पर्यावरण संरक्षण, जल संकट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक प्रश्न, साइबर अपराध, डिजिटल लत और पारिवारिक संवाद जैसे विषय समाज के केंद्र में हैं। इन पर संवेदनशील और शोधपूर्ण लेखन हिंदी साहित्य को नई दिशा दे सकता है।
इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि हम भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करें। भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव परिवर्तन को स्वीकार करते हुए मूल्यों की रक्षा करना रहा है। यदि नई तकनीक मानवता के हित में है तो उसका विवेकपूर्ण उपयोग साहित्य में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। परंपरा और आधुनिकता का यह समन्वय ही हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावशाली बना सकता है।
प्रकाशकों, संपादकों और साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें नए लेखकों को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन विषयों पर विशेषांक प्रकाशित करने चाहिए जो समाज के भविष्य से जुड़े हैं। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को भी साहित्य और विज्ञान, साहित्य और तकनीक तथा साहित्य और समाज के अंत:विषयक अध्ययन को बढ़ावा देना चाहिए। इससे हिंदी में गंभीर चिंतन का दायरा और विस्तृत होगा।
आज आवश्यकता केवल अच्छी रचनाओं की नहीं, बल्कि दूरदृष्टि की भी है। यदि हिंदी साहित्य अपने प्ााठकों की बदलती आवश्यकताओं को समझते हुए मुक्त विषयों को अपनाता है, तो वह आने वाले दशकों में और अधिक प्रासंगिक, प्रभावशाली और लोकप्रिय बनेगा। अन्यथा वह सीमित पाठक वर्ग तक सिमटने का जोखिम उठाएगा।
अंतत: यह कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य का भविष्य उन लेखकों के हाथों में है जो साहसपूर्वक नए प्रश्न पूछेंगे, नए विषय चुनेंगे और बदलते भारत की नई चेतना को शब्द देंगे। साहित्य तभी जीवित रहता है जब वह समाज के साथ चलता है। इसलिए अब समय आ गया है कि हिंदी साहित्य परंपरा की जड़ों को सुरक्षित रखते हुए मुक्त विषयों के विस्तृत आकाश में नई उड़ान भरे। यही उसकी शक्ति है, यही उसकी आवश्यकता है और यही उसके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग भी।
