२० जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के दौरान क्या हुआ, यह अब केवल सरकारी बयानों का विषय नहीं रह गया है। केंद्र सरकार का दावा है कि न कोई गोली चली, न लाठीचार्ज हुआ, न आंसू गैस छोड़ी गई और न ही किसी प्रकार की बल प्रयोग की कार्रवाई हुई। लेकिन घटनास्थल की तस्वीरें, वीडियो और सुरक्षा बलों से जुड़ी उपलब्ध जानकारियां इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
यदि वास्तव में कोई बल प्रयोग नहीं हुआ, तो फिर घायल छात्रों की तस्वीरें, भगदड़ जैसे हालात और सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जुड़े दृश्य किस ओर इशारा करते हैं? ऐसे मामलों में सरकार का पहला दायित्व तथ्यों को सामने रखना और पारदर्शिता बनाए रखना होता है। लेकिन जब प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध सामग्री और सरकारी दावों में इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता प्रेस कॉन्प्रâेंस में लगातार यह दोहराते रहे कि छात्रों पर न लाठीचार्ज हुआ, न पैलेट गन चली, न आंसू गैस छोड़ी गई और न कोई फायरिंग हुई। संसद में भी यही बात दोहराई गई। यदि सरकार अपने दावों पर पूरी तरह आश्वस्त है, तो उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से पीछे नहीं हटना चाहिए। सच को छिपाने के बजाय निष्पक्ष जांच ही भ्रम और विवाद को समाप्त कर सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू राजनीतिक नैतिकता से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी वर्षों तक उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार को अयोध्या में कारसेवकों पर हुई गोलीबारी के लिए कटघरे में खड़ा करती रही है। उस घटना को लेकर भाजपा ने लगातार सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग की और उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताया।
लेकिन जब आज छात्रों के संसद मार्च के दौरान बल प्रयोग के आरोप केंद्र सरकार पर लग रहे हैं, तब वही राजनीतिक दल किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी स्वीकार करने से बचता दिखाई देता है। यदि अतीत की घटनाओं के लिए राजनीतिक जवाबदेही तय की जा सकती है, तो वर्तमान में भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए। लोकतंत्र में नैतिकता का अर्थ यही है कि जो सिद्धांत विपक्ष में रहते हुए अपनाए जाते हैं, सत्ता में आने के बाद भी उनका पालन किया जाए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों की आवाज को सुरक्षा के नाम पर बलपूर्वक दबाना और फिर ऐसी कार्रवाई से पूरी तरह इनकार करना, दोनों ही चिंताजनक प्रवृत्तियां हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब सत्ता सच स्वीकार करने का साहस दिखाए। लोकतंत्र में असहमति को बल से नहीं, संवाद से उत्तर दिया जाता है।
‘रामराज्य’ का अर्थ केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और जवाबदेही का आदर्श भी माना जाता है। यदि कोई सरकार स्वयं को उन्हीं मूल्यों की प्रतिनिधि बताती है, तो उससे अपेक्षा भी अधिक होती है। ऐसे में तथ्य सामने होने के बावजूद घटनाओं से इनकार करना और राजनीतिक सुविधा के अनुसार अलग-अलग मानदंड अपनाना, उस दावे की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
सरकार के पास आज भी अवसर है कि वह इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, सभी तथ्य सार्वजनिक करे और यदि कहीं अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी तय करे। लोकतंत्र की मजबूती सच स्वीकार करने में होती है, सच से इनकार करने में नहीं।
