पवई, पासपोली और विहार क्षेत्र में अवैध निर्माण का आरोप; वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत कड़ी कार्रवाई और तुरंत ‘स्टॉप-वर्क नोटिस’ की मांग
राजन पारकर / मुंबई
आर्थिक राजधानी मुंबई में विकास के नाम पर प्रकृति का गला घोंटने का खेल बेखौफ जारी है। पवई झील, पासपोली और विहार झील परिसर में कथित अवैध निर्माणों ने अब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब अदालत के आदेश मौजूद हैं, तब भी आखिर किसके संरक्षण में यह निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी है?
लोकसभा में नियम 377 के तहत उठाए गए इस गंभीर मुद्दे में कहा गया कि वर्ष 2022 में मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। संवेदनशील वन क्षेत्र में भारी मशीनों, निर्माण गतिविधियों और ध्वनि प्रदूषण के कारण मगरों सहित अनेक दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास तेजी से नष्ट हो रहा है।
बताया गया कि यह पूरा क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में संरक्षित मगर प्रजाति का प्रमुख आवास और प्रजनन क्षेत्र है। विहार झील, संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के इको-सेंसिटिव ज़ोन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी प्रकार का निर्माण गंभीर कानूनी उल्लंघन माना जाता है।
इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय संस्था आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में शामिल कई दुर्लभ पक्षियों का प्राकृतिक आवास भी इन निर्माणों की भेंट चढ़ रहा है। दूसरी ओर, पवई झील को रामसर स्थल का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया जारी है, लेकिन उसी झील के आसपास पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
लोकसभा में केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्रालय से मांग की गई कि पूरे क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों पर तत्काल ‘स्टॉप-वर्क नोटिस’ जारी किया जाए। साथ ही, हुए पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय तथ्य-खोज समिति भेजी जाए तथा वन्यजीवों के आवास को नष्ट करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और बिल्डरों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 51 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मुंबई की हरियाली और जलस्रोतों को कंक्रीट के जंगल में बदलने की यह दौड़ आखिर कब रुकेगी? अदालत के आदेश, पर्यावरण कानून और वन्यजीव संरक्षण के नियम यदि केवल कागज़ों तक सीमित रह गए हैं, तो यह केवल प्रकृति ही नहीं, बल्कि कानून के शासन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
