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संपादकीय: (भाजपा की) मां इस वक्त क्या कर रही है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय जनता पार्टी की मातृ-संस्था है। इसलिए ‘मां इस वक्त क्या कर रही है?’, यह सवाल भारतवासियों के मन में उठ रहा है। ‘जंतर-मंतर’ आंदोलन के बाद देश में काफी कुछ बदलता हुआ दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह अचानक गायब हो गए हैं। वहीं दूसरी तरफ, सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने ‘जेन-जी’ से संवाद करने का पैâसला किया है। मुंबई में मोहनराव खुद लगभग दो हजार ‘जेन-जी’ से बात करेंगे और युवाओं के मन को टटोलेंगे। युवाओं के मन में इतना आक्रोश और खलबली क्यों मची है, भागवत इसे समझने की कोशिश करेंगे; लेकिन दूसरी ओर, ‘आंदोलन’ से दहली हुई उनकी अपनी ही सरकार ने इन ‘जेन-जी’ से निपटने की पूरी तैयारी कर रखी है। सरकार की पूरी ताकत इन युवाओं को कुचलने में लगा दी गई है। पुलिस, प्रशासन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े तमाम संगठनों को बच्चों के खिलाफ सक्रिय कर दिया गया है। बजरंग दल के लोगों ने तो आंदोलनकारी युवाओं को धमकाना और पीटना पहले ही शुरू कर दिया था। ऐसे माहौल में सरसंघचालक आखिर किस ‘जेन-जी’ से संवाद करनेवाले हैं? संघ के स्वयंसेवकों, भाजपा पदाधिकारियों के बच्चों या उनके पोते-पोतियों को ‘जेन-जी’ के नाम पर इकट्ठा करके अगर सरसंघचालक उनसे संवाद करने जा रहे हैं तो यह उचित नहीं है। भागवत को उन युवाओं से बात करनी चाहिए, जो सीधे आंदोलन के मैदान में उतरे हैं और शाह के आदेश पर पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज में घायल हुए हैं। संघ को मुंबई के आंदोलन में पुलिस की गाड़ी रोकने वाली रिया अहीर से बात करनी चाहिए, जिसने पुलिस की गाड़ी रोककर गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में लिए गए आंदोलनकारी युवाओं को छुड़ाया था। अब पुलिस और भाजपा के
भाड़े के टट्टुओं द्वारा
रिया का उत्पीड़न किया जा रहा है। रिया दो दिन पहले दिल्ली आकर राहुल गांधी से मिली और उसने पुलिसिया अत्याचार की आपबीती सुनाई। रिया की तरह अनगिनत लड़के-लड़कियों को ऐसे ही उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही यह घोषणा कर दी हो कि उन्होंने आंदोलनकारी युवाओं को माफ कर दिया है, फिर भी पुलिस और भाजपा के लोग इन बच्चों को परेशान कर रहे हैं। क्या गृहमंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री मोदी के आदेशों को नहीं मानते? प्रधानमंत्री माफी देने का एलान करते हैं और गृह मंत्रालय ठीक उसके उलट रुख अपनाता हुआ दिखाई देता है। यह सरकार के भीतर की अराजकता है। युवा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं और पुलिस उनके घरों तक पहुंचकर उनके माता-पिता को परेशान कर रही है, तो मोहन भागवत को इसे तुरंत रुकवाना चाहिए। संघ ने १९७५ में आपातकाल का विरोध किया था। सरकार के खिलाफ संघर्ष, आंदोलन, हड़ताल वगैरह पर तब पाबंदी थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तब इसे एक तरह की तानाशाही बताते हुए जमकर हल्ला बोला था। संघ के तत्कालीन नेताओं और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारियां हुई थीं। वे तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी आज सत्ता में बैठे हैं और मोदी-शाह की मनमानी का विरोध करनेवाले युवाओं का उत्पीड़न खुली आंखों से देख रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र को मोदी और शाह ने अधिनायकवाद में बदल दिया है। तमाम संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया गया है। राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में बेचा जा रहा है और मानवीय मूल्यों का हनन जारी है। दरअसल, इस सब के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आवाज उठाकर देशभक्ति का शंखनाद करना चाहिए था, लेकिन मोदी-शाह के इस
पापी मंगल मिलन में
संघ खुद शामिल हो गया और जब भारत के युवा सड़कों पर उतरकर तानाशाही का धिक्कार कर रहे थे, तब भी संघ मौन व्रत धारण किए बैठा रहा, क्या मोहन भागवत को यह उचित लगता है? संघ के नेता अतुल लिमये ने आंदोलनकारी युवाओं को ‘देशद्रोही’ तक कह डाला। अगर जंतर-मंतर का आंदोलन और उनका समर्थन करनेवाले देशभर के लाखों ‘जेन-जी’ देशद्रोही ठहराए जा रहे हैं तो सरसंघचालक उन युवाओं से संवाद करने के लिए मैदान में क्यों उतरे हैं? ऐसे देशद्रोहियों से बात करने के जुर्म में अतुल लिमये जैसे लोग तो कल सरसंघचालक को भी ‘देशद्रोही’ करार दे देंगे। मोहन भागवत को ‘संघी’ जेन-जी का मेला आयोजित करने के बजाय पुलिस द्वारा युवाओं पर हो रहे अत्याचारों और दर्ज किए जा रहे झूठे मुकदमों को रुकवाना चाहिए। युवाओं को उपदेश का डोज देने के बजाय अमित शाह द्वारा उन पर छोड़ी गई पुलिस पर लगाम कसना संघ की प्राथमिकता होनी चाहिए। ‘जंतर-मंतर’ पर सरकार के खिलाफ आंदोलन करनेवाले युवा जब एके-४७, आंसू गैस, कीलों वाले डंडों, पैलेट गन्स और भाजपा की ‘ट्रोल आर्मी’ की बदनामी का सामना कर रहे थे, तब भाजपा की मातृ-संस्था संघ रूपी ‘मां’ क्या कर रही थी? वह युवाओं के बचाव के लिए सड़कों पर क्यों नहीं उतरी? पुलिस ने लड़कियों का सरेराह उत्पीड़न किया। इस पर गृहमंत्री को वास्तव में माफी मांगनी चाहिए थी, लेकिन गृहमंत्री संसद से गायब हैं। संघ को चाहिए कि वह गृहमंत्री को पक़डकर सदन में लाए। अगर यह उनसे नहीं हो पा रहा है, तो उन्हें ‘जेन-जी’ के मुद्दे पर फिजूल की चौधराहट नहीं करनी चाहिए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ‘जेन-जी’ को खतरनाक वायरस और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताकर अपराधी ठहराते हैं और सरसंघचालक उसी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से संवाद करने का मन बनाते हैं। यह उनके अपने परिवार के भीतर का ‘केमिकल लोचा’ है। इसी वजह से ‘भाजपा की मां इस वक्त क्या कर रही है?’, इस सवाल का जवाब आज पूरी जनता तलाश रही है।

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