सैयद सलमान / मुंबई
पाकिस्तान लंबे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया का स्वयंभू अगुआ और पश्चिम एशिया की कूटनीति का अनिवार्य खिलाड़ी बताता रहा है। उसकी राजनीति और विदेश नीति में यह दावा बार-बार दोहराया जाता है कि इस्लामी देशों के बीच किसी भी बड़े संकट में उसकी भूमिका निर्णायक होती है। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की हालिया कोशिशों ने इस दावे की पोल खोल दी है।
शक्ति संतुलन और भरोसे पर संदेह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत आगे बढ़ाने का श्रेय सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर को दिया, जबकि पाकिस्तान का कहीं उल्लेख तक नहीं हुआ। यह किसी प्रकार की औपचारिक या कूटनीतिक चूक नहीं है। यह बदलते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का स्पष्ट संकेत है।
यह विडंबना इसलिए भी है कि कुछ समय पहले तक पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा था। पाकिस्तानी नेतृत्व ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताने की कोशिश भी की। लेकिन जब वास्तविक संवाद और विश्वास की परीक्षा का समय आया तो अमेरिका ने उन देशों पर विश्वास जताया जिनकी आर्थिक क्षमता, क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक विश्वसनीयता कहीं अधिक मजबूत है। पाकिस्तान यह भूल गया कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में खोखले दावों से अधिक महत्व भरोसे, क्षमता और निरंतरता का होता है। इसीलिए अमेरिका में अब पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। फॉक्स न्यूज पर सेवानिवृत्त अमेरिकी जनरल जैक कीन ने पाकिस्तान और कतर के ईरान से निकट संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे देशों को मध्यस्थ बनाना अमेरिका के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय तक अमेरिका का प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी रहा है। यदि अमेरिकी रणनीतिक हलकों में ही पाकिस्तान की निष्पक्षता और भरोसे पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है तो यह उसकी घटती कूटनीतिक साख का संकेत है।
पाकिस्तान की यह स्थिति अचानक नहीं बनी। दशकों से उसकी विदेश नीति विरोधाभासों से घिरी रही है। एक ओर वह अमेरिका से सुरक्षा और आर्थिक सहायता चाहता है, दूसरी ओर चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को लगातार मजबूत करता रहता है। ईरान से धार्मिक और भौगोलिक संबंध बनाए रखता है, जबकि सऊदी अरब और खाड़ी देशों से आर्थिक सहयोग तथा राजनीतिक समर्थन भी चाहता है। आतंकवाद के मुद्दे पर उसका रिकॉर्ड भी वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय संदेह के घेरे में रहा है। ऐसे में किसी भी पक्ष के लिए उस पर पूरी तरह भरोसा करना आसान नहीं रह जाता। अमेरिका-ईरान संघर्ष की पृष्ठभूमि में भी यही तस्वीर उभरकर सामने आई। इस पूरे संकट का सबसे सीधा असर खाड़ी क्षेत्र पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी अस्थिरता से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए सऊदी अरब, यूएई और कतर के लिए यह महज कूटनीतिक विषय न होकर, उनकी अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का प्रश्न है। यही कारण है कि अमेरिका ने भी संवाद के लिए उन्हीं देशों को अधिक महत्व दिया, जिनके पास संसाधन, प्रभाव और व्यावहारिक हित मौजूद हैं। पाकिस्तान इस समीकरण में स्वाभाविक रूप से पीछे रह गया।
आर्थिक और राजनीतिक क्षमता
यह घटनाक्रम मुस्लिम देशों के भीतर बदलते नेतृत्व की तस्वीर भी सामने रखता है। जिस पाकिस्तान को इस्लामी दुनिया की आवाज होने का मुगालता था, वह अब अविश्वसनीय हो गया है। आज अधिकांश प्रभावशाली मुस्लिम देश अपने राष्ट्रीय हितों को धार्मिक भावनाओं से ऊपर रखकर निर्णय ले रहे हैं। खाड़ी देशों ने आर्थिक शक्ति, निवेश, तकनीकी विकास और सक्रिय कूटनीति के दम पर अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत की है। इसके विपरीत पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ते कर्ज और आंतरिक सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। सिर्फ धार्मिक पहचान किसी देश को नेतृत्व का अधिकार नहीं दिला सकती। यही कारण है कि मुस्लिम जगत में भी पाकिस्तान की स्वीकार्यता पहले जैसी नहीं रही। इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) जैसे मंचों पर भी वास्तविक प्रभाव अब उन देशों का अधिक दिखाई देता है जिनकी आर्थिक और राजनीतिक क्षमता मजबूत है। पाकिस्तान की आवाज सुनी जरूर जाती है, लेकिन निर्णायक भूमिका प्राय: खाड़ी देशों के हाथ में रहती है। यह बदलाव एक प्रमाण है कि आधुनिक रणनीति में भावनात्मक कूटनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता और विश्वसनीयता निर्णायक होती है।
भविष्य में परिस्थितियां बदल भी सकती हैं और पाकिस्तान को किसी विशेष मुद्दे पर सीमित भूमिका भी मिल सकती है। लेकिन फिलहाल अमेरिका-ईरान वार्ता से उसका लगभग बाहर रह जाना एक स्पष्ट संदेश है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सम्मान सिर्फ बहकावे, दावे या आत्मप्रशंसा से नहीं मिलता, उसके लिए आर्थिक मजबूती, राजनीतिक स्थिरता, स्पष्ट विदेश नीति और सबसे बढ़कर भरोसा अर्जित करना होता है। पाकिस्तान के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि जब विश्व की बड़ी शक्तियां और प्रभावशाली मुस्लिम देश किसी संकट के समाधान के लिए उसे जरूरी न समझें, तो यह कूटनीतिक उपेक्षा नहीं, उसकी घटती वैश्विक साख का आईना भी है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
