कविता श्रीवास्तव
-बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ हमारा साथ चाहिए होता है। हर जरूरत पैसे से पूरी नहीं होती। कुछ जरूरतें अपनापन मांगती हैं। एक मुस्कान मांगती हैं। सिर्फ अपने बच्चों की मौजूदगी मांगती हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत परिवार रहा है।
मुंबई के एक बुजुर्ग व्यवसायी ने जीवन के आखिरी तीन साल वृद्धाश्रम में बिताए। हरियाणा के सोनीपत में उनकी मौत हो गई। उनका कोई रिश्तेदार अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया। वृद्धाश्रम के स्टाफ व अन्य ने अंतिम संस्कार पूरा किया। मुंबई, उ.प्र. और नेपाल से उनकी तीन बेटियां वीडियो कॉल पर दूर से बस देख भर रही थीं। यह खबर सिर्फ आंखें नम नहीं करती, बल्कि कई सवाल भी उठाती है। आज हम आधुनिक हो रहे हैं। तकनीक तेज हो रही है। दुनिया छोटी हो गई है। लेकिन क्या खून के रिश्ते बरकरार हैं या दूरियां बढ़ गई हैं? आज हमारे पास मोबाइल के लिए खूब समय है। लेकिन अपनों के लिए समय नहीं है। हम करियर बना रहे हैं। सपने पूरे कर रहे हैं। लेकिन अपने रिश्ते छोड़ते जा रहे हैं? कोई भी माता-पिता सिर्फ जन्म देनेवाले नहीं होते। वे हमारी पहली पाठशाला होते हैं। पहले गुरु होते हैं। सुरक्षा होते हैं। प्रेरणा होते हैं। बचपन में वे हमारी उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैं। बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ हमारा साथ चाहिए होता है। हर जरूरत पैसे से पूरी नहीं होती। कुछ जरूरतें अपनापन मांगती हैं। एक मुस्कान मांगती हैं। सिर्फ अपने बच्चों की मौजूदगी मांगती हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत परिवार रहा है।
यही हमारी पहचान है, हमारी विरासत है, हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। हमारी सभ्यता ने हमेशा सिखाया है कि माता-पिता का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है। उनकी सेवा सबसे बड़ा पुण्य है। उनका आशीर्वाद सबसे बड़ी संपत्ति है। समय बदलना गलत नहीं है। सोच बदलना भी गलत नहीं है। लेकिन अगर बदलाव हमें अपने ही लोगों से दूर कर दे, तो उस बदलाव पर सोचने की जरूरत है। वीडियो कॉल सुविधा हो सकती है। लेकिन वह एक बेटे या बेटी के स्पर्श की जगह नहीं ले सकती। पैसा जीवन को आसान बनाता है। लेकिन अपनापन जीवन को अर्थ देता है। बुजुर्गों को दवा की जरूरत होती है। उन्हें अपनेपन की जरूरत होती है। आज की भागदौड़ में हम सब व्यस्त हैं। लेकिन अपने ही लोग अकेले पड़ जाएं तो सारी व्यस्तता व्यर्थ है। बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं। अगर आज हम अपने माता-पिता से दूरी बनाएंगे, तो कल हमारी अगली पीढ़ी भी यही सीखेगी। रिश्ते विरासत की तरह होते हैं। उन्हें संभालना पड़ता है, समय देना पड़ता है, उन्हें जीना पड़ता है। भारत संस्कारों की धरती है। यहां परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, सम्मान और समर्पण का नाम है। हम तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन रिश्तों की कीमत पर नहीं। सफलता हासिल करें, लेकिन अपनों को खोकर नहीं। अपने माता-पिता के साथ समय बिताएं। उनकी बातें सुनें। उनका हाथ थामें। क्योंकि एक दिन यही पल हमारी सबसे बड़ी याद बनेंगे। किसी भी समाज की असली ताकत उसकी इमारतें नहीं होतीं। उसकी असली ताकत उसके संस्कार होते हैं और संस्कार वहीं जीवित रहते हैं, जहां रिश्ते जीवित रहते हैं।
