राजेश सरकार / प्रयागराज
औद्योगिक क्षेत्र के डेरा नेवादा समोगर गांव में शुक्रवार सुबह एक दर्दनाक हादसे ने निर्माण कार्यों में बरती जा रही घोर लापरवाही की पोल खोल दी। नवनिर्मित सेफ्टी टैंक के भीतर जहरीली मिथेन गैस ने दो मजदूरों की जिंदगी निगल ली। सवाल यह है कि आखिर बिना सुरक्षा इंतजाम, गैस परीक्षण और बचाव उपकरणों के मजदूरों को मौत के कुएं में क्यों उतारा गया?
जानकारी के अनुसार, गांव निवासी धर्मेंद्र केसरवानी के नए मकान में सेफ्टी टैंक का निर्माण कराया जा रहा था। शुक्रवार को उसकी शटरिंग खोलने के लिए दो मजदूर टैंक के अंदर उतरे। टैंक में पहले से ही मिथेन गैस भरी हुई थी। कुछ ही देर बाद दोनों बेहोश होकर गिर पड़े और दम घुटने से उनकी मौत हो गई।
प्रत्यक्षदर्शी तो कोई नहीं है, लेकिन आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि टैंक के अंदर किसी भारी वस्तु के गिरने जैसी तेज आवाज सुनाई दी थी। इसी वजह से हादसे को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। क्या दोनों मजदूर काम करते समय एक साथ गिरे, या पहले एक मजदूर जहरीली गैस की चपेट में आया और दूसरा उसे बचाने के लिए नीचे उतरा, लेकिन खुद भी मौत का शिकार बन गया? इस रहस्य से अभी पर्दा नहीं उठ सका है।
मृतकों की पहचान औद्योगिक क्षेत्र थाना के बेंदो गांव निवासी नेहाल शुक्ला, पुत्र मथुरा प्रसाद तथा रजत शुक्ला, पुत्र विनोद शुक्ला के रूप में हुई है। इस हादसे ने दोनों परिवारों पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है।
औद्योगिक क्षेत्र थाना प्रभारी कमलेश कुमार पटेल ने बताया कि घटना की सूचना मकान मालिक धर्मेंद्र केसरवानी ने फोन पर दी थी। सूचना मिलते ही पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची। रेस्क्यू कर दोनों मजदूरों को बाहर निकाला गया और तत्काल एसआरएन अस्पताल भेजा गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इसके बाद शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।
अपर पुलिस उपायुक्त यमुनानगर ने बताया कि प्रथम दृष्टया दोनों मजदूरों की मौत सेफ्टी टैंक के भीतर दम घुटने से हुई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मकान मालिक धर्मेंद्र केसरवानी और निर्माण कार्य के ठेकेदार को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या निर्माण कार्य के दौरान श्रमिक सुरक्षा के निर्धारित मानकों की अनदेखी की गई थी।
यह हादसा केवल दो मजदूरों की मौत नहीं, बल्कि निर्माण स्थलों पर सुरक्षा नियमों की खुलेआम उड़ाई जा रही धज्जियों का भयावह उदाहरण है। यदि समय रहते गैस की जांच, ऑक्सीजन की उपलब्धता और सुरक्षा उपकरणों की व्यवस्था की गई होती, तो शायद दो परिवारों के चिराग आज बुझने से बच जाते। अब बड़ा सवाल यह है कि इस मौत की जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी और दोषियों पर कब तक सख्त कार्रवाई होगी?
