शीतल अवस्थी
नारद जी कहते हैं- मुने! श्रीरामचंद्रजी ने महर्षि वसिष्ठ तथा माताओं को प्रणाम करके उन सबको भरत के साथ विदा कर दिया। तत्पश्चात महर्षि अत्रि तथा उनकी पत्नी अनुसूया को, शरभंग मुनि को, सुतीक्ष्ण को तथा अगस्त्यजी के भ्राता अग्निजिह्व मुनि को प्रणाम करते हुए श्री रामचंद्रजी ने अगस्त्य मुनि के आश्रम पर जा उनके चरणों में मस्तक झुकाया और मुनि की कृपा से दिव्य धनुष एवं दिव्य खड्ग प्राप्त करके वे दंडकारण्य में आए। वहां जनस्थान के भीतर पंचवटी नामक स्थान में गोदावरी के तट पर रहने लगे। एक दिन शूर्पणखा नाम वाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण और सीता को खा जाने के लिए पंचवटी में आई, किंतु श्री रामचंद्रजी का अत्यंत मनोहर रूप देखकर वह काम के अधीन हो गई और बोली, ‘तुम कौन हो? कहां से आए हो? मेरी प्रार्थना से अब तुम मेरे पति हो जाओ। यदि मेरे साथ तुम्हारा संबंध होने में ये दोनों (सीता और लक्ष्मण) बाधक हैं तो मैं इन दोनों को अभी खाए लेती हूं।’ ऐसा कहकर वह उन्हें खा जाने को तैयार हो गई, तब श्री रामचंद्रजी के कहने से लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और दोनों कान काट लिए। कटे हुए अंगों से रक्त की धारा बहाती हुए शूर्पणखा अपने भाई खर के पास गई और इस प्रकार बोली, ‘खर! मेरी नाक कट गई। इस अपमान के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। अब तो मेरा जीवन तभी रह सकता है, जब कि तुम मुझे राम का, उनकी पत्नी सीता का तथा उनके छोटे भाई लक्ष्मण का गरम-गरम रक्त पिलाओ।’ खर ने उसको ‘बहुत अच्छा’, कहकर शांत किया और दूषण तथा त्रिशिरा के साथ चौदह हजार राक्षसों की सेना ले श्री रामचंद्रजी पर चढ़ाई की। श्रीराम ने भी उन सबका सामना किया और अपने बाणों से राक्षसों को बींधना आरंभ किया। शत्रुओं की हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सहित समस्त चतुरंगिणी सेना को उन्होंने यमलोक पहुंचा दिया तथा अपने साथ युद्ध करने वाले भयंकर राक्षस खर-दूषण एवं त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया। अब शूर्पणखा लंका में गई और रावण के सामने जा पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसने क्रोध में भरकर रावण से कहा, ‘अरे! तू राजा और रक्षक कहलाने योग्य नहीं है। खर आदि समस्त राक्षसों को संहार करने वाले राम की पत्नी सीता को हर ले। मैं राम और लक्ष्मण का रक्त पीकर ही जीवित रहूंगी, अन्यथा नहीं। ‘
शूर्पणखा की बात सुनकर रावण ने कहा, ‘अच्छा, ऐसा ही होगा।’ फिर उसने मारीच से कहा, ‘तुम स्वर्णमय विचित्र मृग का रूप धारण करके सीता के सामने जाओ और राम तथा लक्ष्मण को अपने पीछे आश्रम से दूर हटा ले जाओ। मैं सीता का हरण करूंगा। यदि मेरी बात न मानोगे, तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।’ मारीच ने रावण से कहा, ‘रावण! धनुर्धन राम साक्षात मृत्यु हैं।’ फिर उसने मन-ही-मन सोचा, ‘यदि नहीं जाऊंगा, तो रावण के हाथ से मरूंगा। इस प्रकार यदि मरना अनिवार्य है तो इसके लिए श्रीराम ही श्रेष्ठ हैं, रावण नहीं।’ (क्योंकि श्रीराम के हाथ से मृत्यु होने पर मेरी मुक्ति हो जाएगी) ऐसा विचार कर वह मृग रूप धारण करके सीता के सामने बार-बार आने-जाने लगा। तब सीताजी की प्रेरणा से श्रीराम ने दूर तक उसका पीछा करके उसे अपने बाण से मार डाला। मरते समय उस मृग ने ‘हे सीते! हे लक्ष्मण!’ कहकर पुकार लगाई। उस समय सीता के कहने से लक्ष्मण अपनी इच्छा के विरुद्ध श्रीराम के पीछे गए। इसी बीच में रावण ने भी मौका पाकर सीता को हर लिया। मार्ग में जाते समय उसने गृध्रराज जटायु का वध किया। जटायु ने भी उसके रथ को नष्ट कर डाला था। रथ न रहने पर रावण ने सीता को कंधे पर बिठा लिया और उन्हें लंका ले जाकर अशोक वाटिका में रखा। वहां सीता से बोला, ‘तुम मेरी पटरानी बन जाओ।’ फिर राक्षसियों की ओर देखकर कहा, ‘निशाचरियों! इसकी रखवाली करो’। उधर श्री रामचंद्रजी जब मारीच को मारकर लौटे, तो लक्ष्मण को आते देख बोले, ‘सुमित्रानंदन! वह मृग तो मायामय था, वास्तव में वह एक राक्षस था; किंतु तुम जो इस समय यहां आ गए, इससे जान पड़ता है, निश्चय ही कोई सीता को हर ले गया।’ श्री रामचंद्रजी आश्रम पर गए, किंतु वहां सीता नहीं दिखाई दीं। उस समय वे आर्त होकर शोक और विलाप करने लगे, ‘हे प्रिये जानकी! तू मुझे छोड़कर कहां चली गई?’ लक्ष्मण ने श्री राम को सांत्वना दी। तब वे वन में घूम-घूमकर सीता की खोज करने लगे। इसी समय इनकी जटायु से भेंट हुई। जटायु ने यह कहकर कि ‘सीता को रावण हर ले गया है’ प्राण त्याग दिए। तब श्री रघुनाथजी ने अपने हाथ से जटायु का दाह-संस्कार किया। इसके बाद इन्होंने कबंध का वध किया। कबंध ने शाप मुक्त होने पर श्री रामचंद्रजी से कहा, ‘आप सुग्रीव से मिलिए’।
