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उपेक्षा के चलते खत्म हो रहे पारंपरिक जल श्रोत…जल संरक्षण की मुहिम पर सवाल

राजेश सरकार / प्रयागराज

एक ओर सरकार जल संरक्षण और भूजल स्तर सुधारने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर गांवों के पारंपरिक जल स्रोत उपेक्षा के कारण अस्तित्व खोते जा रहे हैं। शंकरगढ़ क्षेत्र के नगर पंचायत और ग्रामीण इलाकों में कभी जीवनदायिनी रहे पुराने कुएं आज गंदगी, झाड़ियों और रख-रखाव के अभाव में बदहाल पड़े हैं। कपारी गांव का ऐतिहासिक “बोखबा कुआं” इसकी सबसे बड़ी मिसाल बन गया है।
ग्रामीणों के अनुसार, एक समय यह कुआं गांव की करीब 80 प्रतिशत पेयजल और दैनिक जरूरतों को पूरा करता था। विशाल परिधि और गहराई वाले इस कुएं से शादी-विवाह, गृह निर्माण, खेती-किसानी, पशुओं के लिए पानी तथा घरेलू उपयोग जैसी अनेक आवश्यकताएं पूरी होती थीं। बुजुर्ग बताते हैं कि कभी पूरा गांव इसी कुएं पर निर्भर था और इसे गांव की जीवनरेखा माना जाता था।
वर्तमान में भी गांव के लगभग 10 परिवार इस कुएं के पानी का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन वर्षों से साफ-सफाई और संरक्षण नहीं होने के कारण इसकी दीवारों पर झाड़ियां उग आई हैं तथा कुएं के भीतर कचरे का अंबार जमा हो गया है। इससे न केवल इसकी उपयोगिता प्रभावित हुई है, बल्कि इसकी संरचना को भी नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कुएं की सफाई, मरम्मत और सुंदरीकरण कराया जाए, तो यह दोबारा जल संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उनका मानना है कि पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन से भूजल स्तर में सुधार होगा और जल संकट से निपटने में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण भूजल रिचार्ज और पर्यावरण संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। कपारी गांव ही नहीं, बल्कि पूरे शंकरगढ़ क्षेत्र के अधिकांश पुराने कुएं इसी तरह उपेक्षा का शिकार हैं।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र के पारंपरिक कुओं की नियमित सफाई, मरम्मत और संरक्षण सुनिश्चित किया जाए, ताकि ये ऐतिहासिक जल स्रोत फिर से गांवों की प्यास बुझाने और जल संरक्षण की मुहिम को मजबूती देने में अपनी भूमिका निभा सकें।

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