धीरज फूलमती सिंह
मुंबई
अब खांसने को हल्के में लेने का समय गया। पहले ऐसा होता था कि जब किसी को खांसी होती तो बड़े आराम से टहलते हुए मेडिकल की दुकान पर चला जाता था और बिना किसी हीला-हवाली के मेडिकल वाला खांसी की दवाई वाली शीशी पकड़ा देता था, लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा। अब से १२ प्रतिशत से ज्यादा एल्कोहल वाली और ३० मिलीलीटर से बड़ी बोतलों में बिकने वाली ओरल दवाएं, अब बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलेंगी। सरकार ने देश में कफ सिरप और टॉनिक जैसी दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग को रोकने के लिए यह बेहद सख्त कदम उठाया है और ऐसा कदम जरूरी भी था। अब मेडिकल स्टोर वाले अपनी मनमर्जी से १२ प्रतिशत से अधिक अल्कोहल वाली दवाएं सीधे काउंटर से नहीं बेच सकेंगे। सरकार ने नए नियमों के तहत ऐसी सभी दवाओं की खुली बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी है। भारत में अल्कोहल युक्त सिरप और टॉनिक का प्रयोग लंबे समय से नशे के विकल्प के रूप में धड़ल्ले से किया जा रहा था। इसके अलावा कोडीन वाले कफ सिरप की बड़े पैमाने पर होने वाली तस्करी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी, बड़ा सिरदर्द थी। पिछले साल राजस्थान और मध्य प्रदेश में कफ सिरप के कथित गलत इस्तेमाल से कुछ मासूम बच्चों की मौत की खबर आई थीं, इसलिए भी सुरक्षा मानकों को कड़ा करने की मांग लगातार उठने लगी थी।
इस प्रावधान के तहत इलायची, अदरक और अन्य मसालों से बनी कुछ दवाओं को अल्कोहल की तय सीमा से छूट मिली हुई थी। इस छूट के कारण कुछ ऐसे उत्पाद बाजार में बेचे जा रहे थे, जिनमें इथाइल अल्कोहल की मात्रा ८० प्रतिशत तक थी, यह मानक नशे के लिए होता है, लेकिन उन्हें दवा के रूप में बेचा जा रहा था। यदि कोई व्यक्ति ऐसी दवाओं का जरूरत से ज्यादा सेवन करता है या जानबूझकर उनका दुरुपयोग करता है, तो इससे नशे जैसे प्रभाव, चक्कर आना, अत्यधिक नींद, बेहोशी या अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। नशेड़ियों की तरह वो इस अल्कोहल मिश्रित दवाई का आदी हो सकता है। इसी कारण १२ प्रतिशत से अधिक एथिल एल्कोहल वाली कुछ ओरल दवाओं की बिक्री पर सख्त नियम लागू किए गए हैं। सरकार ने कहा है कि इस कदम का उद्देश्य मरीजों को जरूरी उपचार से वंचित करना नहीं, बल्कि अल्कोहल युक्त दवाओं के दुरुपयोग पर रोक लगाना है।
