-आरोपी सुभाष का दावा-ट्रस्ट पदाधिकारियों को पहले से थी चोरी की जानकारी, श्रद्धालुओं ने बदला दान का तरीका
अयोध्या / राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की कथित संगठित चोरी को लेकर एक के बाद एक ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो मंदिर की आंतरिक व्यवस्था के साथ-साथ ट्रस्ट के जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अब दावा किया जा रहा है कि चोरी का मामला पुलिस और विशेष जांच दल तक पहुंचने से पहले ही ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने आरोपियों से ढाई से तीन करोड़ रुपए तक बरामद कर लिए थे, लेकिन जांच एजेंसियों के सामने केवल करीब ८० लाख रुपए की बरामदगी ही दिखाई गई।
इस दावे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि जांच में यह सही पाया जाता है तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि शेष रकम कहां गई और उसकी जानकारी एसआईटी तथा पुलिस को क्यों नहीं दी गई। क्या मामले को सीमित चोरी बताकर दबाने की कोशिश हुई, या बरामद रकम का कोई अलग हिसाब तैयार किया गया? जांच एजेंसियों को अब कथित आंतरिक बरामदगी से जुड़े दस्तावेज, कर्मचारियों के बयान और धन जमा करने के अभिलेख खंगालने पड़ सकते हैं। मामले के आरोपी और चढ़ावा गणना व्यवस्था से जुड़े रहे सुभाष श्रीवास्तव ने पूछताछ में कथित रूप से दावा किया है कि मंदिर में चोरी कोई अचानक शुरू हुई घटना नहीं थी। कई महीने पहले भी चढ़ावा गायब होने की जानकारी ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों तक पहुंच चुकी थी, लेकिन उस समय कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इस बार चोरी की रकम काफी अधिक होने और मामला उजागर होने का खतरा बढ़ने के बाद ट्रस्ट पदाधिकारियों ने स्वयं धरपकड़ शुरू की तथा आरोपियों से रकम बरामद कराई।
पुलिस में पहले शिकायत क्यों नहीं की गई?
सुभाष के कथित खुलासे ने जांच का दायरा सामान्य कर्मचारियों से आगे बढ़ाकर निगरानी और वित्तीय नियंत्रण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचा दिया है। सवाल यह है कि चोरी की जानकारी पहले मिलने के बावजूद पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की गई?
एसआईटी ने जांच के दौरान तत्कालीन महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव के साथ ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि की भूमिका और जिम्मेदारियों की भी पड़ताल की। जांच टीम अयोध्या के वैदेही भवन पहुंची, जहां स्वामी गोविंद देव गिरि प्रवास के दौरान ठहरते हैं। टीम ने उनके प्रवास, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और चढ़ावा प्रबंधन में उनकी भूमिका से जुड़े तथ्यों का सत्यापन किया। हालांकि, एसआईटी ने गोविंद देव गिरि या अन्य पदाधिकारियों के संबंध में क्या निष्कर्ष निकाला, इसका आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ है। अब अंतिम जांच रिपोर्ट ही बताएगी कि यह केवल कर्मचारियों की चोरी थी या फिर लापरवाही, जानकारी छिपाने और मामले को दबाने की कोशिश की परतें ट्रस्ट के ऊंचे पदों तक पहुंचती हैं।
सोने-चांदी के दान में आई भारी कमी
इस पूरे प्रकरण का असर श्रद्धालुओं के दान देने के तरीके पर भी दिखाई देने लगा है। मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था और दर्शन की संख्या पर भले ही कोई स्पष्ट प्रभाव न पड़ा हो, लेकिन दानपात्रों में सोने-चांदी के आभूषण और बेशकीमती सिक्के अब बेहद कम मिल रहे हैं। पहले श्रद्धालु भावुक होकर अंगूठी, चेन, झुमके, कंगन, लॉकेट और सोने-चांदी के सिक्के तक दानपात्र में डाल देते थे। गणना के दौरान ऐसे आभूषणों को अलग कर सुरक्षित रखा जाता था। अब कर्मचारी बताते हैं कि बड़े नोटों की जगह छोटे नोट अधिक आ रहे हैं और कीमती वस्तुओं का दान लगभग बंद हो गया है।
अनियमितताओं के लिए वरिष्ठ लोगों पर जिम्मेदारी
प्रारंभिक रिपोर्ट में एफआईआर दर्ज करने और नए सीईओ की नियुक्ति की सिफारिश की गई थी, जिस पर कार्रवाई जारी है। उन्हें मंदिर प्रबंधन में लापरवाही और निगरानी में नाकामी का जिम्मेदार माना गया है क्योंकि पूरा प्रबंधन उनके अधीन था।
