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संपादकीय : शांति समझौते की ऐसी की तैसी

ईरान और अमेरिका के बीच हुआ शांति समझौता महज चार दिन की चांदनी साबित हुआ है। इसके गंभीर परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने होंगे, लेकिन अमेरिका के हिंसक राष्ट्रपति ट्रंप को भला इससे क्या? वे तो एक व्यापारी हैं। उन्हें हिंसा और युद्ध भी व्यापार जैसे ही लगते हैं। ‘ईरान ने शांति समझौते का पालन नहीं किया’, यह बहाना बनाकर अमेरिका ने बमबारी शुरू कर दी। सौ से अधिक लोग मारे गए, जबकि हजारों घायल हो गए और इसके बदले में ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार चाहिए। यह सरासर मूर्खता है! इस टकराव के कारण कच्चे तेल के दाम भड़ककर ८४ डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं। इससे महंगाई का जबरदस्त विस्फोट होगा। भारत जैसे देश तो इस महंगाई की आग में झुलसकर खाक हो जाएंगे। ईरान पर हमला करने की असली वजह भी व्यावसायिक ही है। मुद्दा यह है कि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण किसका रहेगा? अमेरिका का या ईरान का?’ युद्ध से पहले होर्मुज पर पूरी तरह ईरान का ही नियंत्रण था और शांति समझौते में भी इसे स्वीकार किया गया था। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने वहां अमेरिकी जहाज भेजकर नाकेबंदी कर दी और वहां से गुजरने वाले जहाजों से २० प्रतिशत टोल वसूलने का फरमान जारी कर दिया। ईरान की समुद्री सीमा में इस डकैती को स्वीकार नहीं किया गया और जंग दोबारा छिड़ गई। अब ट्रंप ने उस २० प्रतिशत टोल माफी का फरमान वापस ले लिया है। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि इस २० प्रतिशत टोल माफी के बदले खाड़ी देश अमेरिका में भारी निवेश करेंगे, जिससे लाखों नए रोजगार पैदा होंगे। यानी ट्रंप युद्ध का फायदा उठाने के लिए छटपटा रहे हैं। होर्मुज जलमार्ग से मुनाफा कमाने का यह तरीका कतई सही नहीं है और इसी वजह से शांति समझौता टूट गया है। जंग के कारण होर्मुज मार्ग फिर से बंद हो गया है। ईरानी सेना ने साफ एलान किया है कि, ‘हम अमेरिका की इस दादागीरी के आगे कतई नहीं झुकेंगे। युद्ध, साजिशों और राष्ट्रपति ट्रंप के हिंसक बर्ताव के रहते होर्मुज कभी नहीं खुलेगा। ईरान की सेना एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी।’ इस युद्ध से
भारत को नुकसान
हो रहा है। होर्मुज मार्ग पर दो भारतीय जहाजों पर ईरान ने मिसाइलें दाग दीं। इसमें एक भारतीय इंजीनियर की मौत हो गई और २५ लोग घायल हो गए। इस पर भारत सरकार ने ईरान के दूतावास अधिकारियों को बुलाकर महज ‘कड़े शब्दों में चेतावनी’ दी। अब कड़े शब्दों में चेतावनी देने का क्या मतलब होता है? प्रधान मंत्री मोदी को युद्ध के मुद्दों पर हमेशा मौन साधे रहने के लिए कोई ‘मेडल’ दिया जाना चाहिए। पीएम मोदी को देश-विदेश जाकर ‘मेडल’ बटोरने का शौक सा लग गया है, इसमें एक और मेडल जुड़ जाएगा। अमेरिका-ईरान युद्ध भले ही एक वैश्विक संकट हो, लेकिन भारत कहीं भी रीढ़ सीधी करके खड़ा दिखाई नहीं दे रहा है। हर तरफ बस लाचारी और समर्पण ही नजर आ रहा है। भारतीय जहाजों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए आखिर ‘विश्वगुरु’ क्या कर रहे हैं? जनता आज यही सवाल पूछ रही है। चुनाव से पहले ‘मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा दिया’ जैसी राजनीतिक अफवाहें उड़ाने वालों को आज भारतीय जहाजों पर हो रहे हमले दिखाई नहीं दे रहे हैं। दावा किया जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पीएम मोदी के पक्के मित्र हैं। अगर यह सच होता तो भारतीय जहाजों पर हमले ही नहीं होते। राष्ट्रपति ट्रंप अगर वैश्विक शांति के दुश्मन हैं तो प्रधानमंत्री मोदी भी भारतीय शांति के उतने ही बड़े दुश्मन हैं। यही वजह है कि इजरायल द्वारा गाजा पट्टी में किए गए नरसंहार पर भारत ने चुप्पी साधे रखी। भारत की इतनी किरकिरी नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक कभी नहीं हुई थी। एक तरफ ईरान होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए लड़ रहा है तो दूसरी तरफ भारत में अरुणाचल के रास्ते चीन अंदर घुस आया है। लद्दाख में उन्होंने अपने पैर मजबूती से जमा लिए हैं, लेकिन हमारी सरकार इसे मानने को तैयार ही नहीं है।
सरकार यानी भाजपा
को मुंबई, पश्चिम बंगाल, असम और तेलंगाना जैसे राज्यों में घुसे हुए बांग्लादेशी तो दिखाई देते हैं और वे इस पर जमकर राजनीति भी करते हैं; लेकिन भारतीय सीमा के भीतर तक घुस आई ‘चीनी’ सेना उन्हें नजर नहीं आती, यह बेहद हैरान करनेवाला है। जहां राजनीतिक फायदा होता है, मोदी सरकार सिर्फ वहीं हरकत में आती है। बाकी अन्य मामलों में सब ठंडा ही मामला है। यही ठंडा रवैया ईरान-अमेरिका युद्ध में मारे जा रहे भारतीय नाविकों के प्रति भी है। होर्मुज में हुए हमले में जो भारतीय युवक अकारण मारा गया, वह पुणे का इंजीनियर हेरंब करमरकर था। हेरंब करमरकर कोई भारत की तरफ से ईरान की जंग लड़ने समुद्र में नहीं गया था; वह तो बस अपनी नौकरी और कर्तव्य निभा रहा था। लेकिन भारतीय जहाजों पर मिसाइलें दागकर उन्हें तबाह कर दिया गया और हेरंब की जान चली गई। मोदी ‘विश्वगुरु’ हैं इसलिए ईरान ने भारतीय जहाजों को बख्श दिया हो, ऐसा कुछ नहीं हुआ। ईरान के हमले में किसी भारतीय की मौत होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले चार महीनों में कम से कम १० से १२ भारतीयों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उन मृतकों की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। इससे साफ पता चलता है कि राजनीति में सक्रिय लोगों की संवेदनाएं कितनी पथरीली और कठोर हो चुकी हैं। उधर, राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमले पूरी तरह से आपराधिक कृत्य हैं। ट्रंप दुनिया में केवल अशांति फैलाना चाहते हैं। ईरान-इजरायल विवाद में ट्रंप को कूदने की कोई जरूरत नहीं थी। इजरायल द्वारा गाजा पट्टी में किए गए नरसंहार से ट्रंप विचलित नहीं हुए, लेकिन जैसे ही ईरान ने होर्मुज पर अपना दावा मजबूत किया, ट्रंप भड़क उठे और एक साथ हजारों मिसाइलें ईरान पर दाग दीं। इसके जवाब में ईरान ने भी दुबई, बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। सच तो यही है कि जब तक अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप और भारत में प्रधानमंत्री मोदी सत्ता में हैं, तब तक आम जनता को मानसिक शांति नसीब नहीं होने वाली।

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