-नमामि गंगे पर हजारों करोड़ ‘हजम’, फिर भी मैली रही गंगा; सीएजी रिपोर्ट ने खोली मोदी सरकार के दावों की पोल
-एसटीपी बने मगर सीवर नहीं जुड़े, गंदा पानी नदी में बहता रहा; कमजोर निगरानी,
-अधूरी परियोजनाओं और ठेकेदारों पर नरमी ने मिशन की नाकामी उजागर की
सामना संवाददाता / देहरादून
गंगा की सफाई को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाने वाली मोदी सरकार के दावों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट ने करारा प्रहार किया है। करीब चार दशक से गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के अभियान चल रहे हैं और हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन गंगा आज भी मैली है।
उत्तराखंड में नमामि गंगे के क्रियान्वयन की जांच ने साफ कर दिया कि सरकार ने प्रचार और परियोजनाओं के उद्घाटन पर जितना जोर दिया, उतनी गंभीरता जमीन पर काम पूरा करने और जवाबदेही तय करने में नहीं दिखाई। सीएजी की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के निर्माण, सीवर नेटवर्क, कचरा प्रबंधन, जल गुणवत्ता की निगरानी और वित्तीय प्रबंधन में गंभीर खामियां दर्ज की गई हैं।
करोड़ों रुपए खर्च के बावजूद गंगा में बह रहा गंदा पानी
गंगा की सफाई को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट का सबसे चौंकानेवाला पहलू यह है कि कई स्थानों पर करोड़ों रुपए खर्च करके एसटीपी तो बना दिए गए, लेकिन घरों और बस्तियों की सीवर लाइनों को उनसे जोड़ा ही नहीं गया। कुछ जगह नेटवर्क केवल आंशिक रूप से जुड़ा था। नतीजा यह हुआ कि गंदा पानी प्लांटों तक पहुंचने के बजाय नालों के रास्ते सीधे गंगा में बहता रहा। सवाल है कि जब सीवर प्लांट तक पहुंचा ही नहीं तो सरकार गंगा की सफाई किस आधार पर दिखाती रही। क्या केवल एसटीपी की इमारत खड़ी कर देना ही नमामि गंगे की सफलता मान लिया गया?
कई संयंत्रों की क्षमता वास्तविक सीवेज भार से कम पाई गई। यानी योजना बनाते समय न तो भविष्य की जरूरतों का सही आकलन किया गया और न ही स्थानीय आबादी की आवश्यकताओं को गंभीरता से समझा गया। कुछ परियोजनाओं में निर्माण और संचालन की कमियां इतनी गंभीर थीं कि संबंधित विभागों ने उन्हें अपने नियंत्रण में लेने से तक इनकार कर दिया। यह स्थिति बताती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना में समन्वय, गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही किस कदर कमजोर रही। सीएजी ने ठोस कचरा प्रबंधन की भी पोल खोल दी। कई नगरों में कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था नहीं थी। कचरा खुले स्थानों, नदी के आसपास और ढलानों पर फेंका जाता रहा। बारिश में इसी कचरे के बहकर गंगा में पहुंचने का खतरा बना रहा।
पानी में बहा जनता का पैसा
जनता का पैसा खर्च होता रहा, समयसीमा टूटती रही, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनियों पर ठोस कार्रवाई का अभाव रहा। नमामि गंगे की विफलता केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का मामला है। मोदी सरकार ने गंगा के नाम पर वोट, भावनाएं और प्रचार बटोरा, लेकिन नदी को निर्मल बनाने की बुनियादी व्यवस्था अधूरी छोड़ दी। सीएजी की रिपोर्ट के बाद सरकार को बताना होगा कि हजारों करोड़ रुपए आखिर गए कहां। गंगा अब तक साफ क्यों नहीं हुई और इस राष्ट्रीय विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा?
