-ईरान युद्ध में कूदा सऊदी अरब
-अमेरिका-सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित गुटों पर किए संयुक्त हमले; शांति वार्ता ठप, तेहरान पर भी भारी अमेरिकी बमबारी
अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी टकराव अब एक नए और अधिक खतरनाक दौर में प्रवेश कर गया है। सऊदी अरब ने पहली बार सार्वजनिक रूप से अमेरिकी सेना के साथ मिलकर इराक में सक्रिय ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों पर हमला किया है। इस कार्रवाई ने आशंका बढ़ा दी है कि अब तक अमेरिका और ईरान के बीच सीमित दिख रहा युद्ध पूरे पश्चिम एशिया को अपनी चपेट में ले सकता है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड और सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, संयुक्त हमले इराक में उन ईरान समर्थित संगठनों के ठिकानों पर किए गए, जिन पर अमेरिकी सैनिकों तथा सऊदी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का आरोप है। इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज ने दावा किया कि हमलों में कम से कम २० लड़ाके मारे गए। कुछ रिपोर्टों में छह ईरानी सलाहकारों की मौत का भी दावा किया गया है।
ईरान के हमले का अमेरिका ने दिया जवाब
यह सैन्य कार्रवाई उस कथित ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल हमले के बाद हुई, जिसका निशाना जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डा था। अमेरिकी सेना का कहना है कि मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कठोर परिणाम भुगतने की धमकी दी और अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर दर्जनों ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले किए।
बीते कुछ दिनों से अमेरिकी और ईरानी सेनाओं के बीच अपेक्षाकृत शांति थी तथा मध्यस्थ देश कूटनीतिक रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन मिसाइल, ड्रोन और हवाई हमलों की नई श्रृंखला ने उस अस्थायी शांति को समाप्त कर दिया है। अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर बातचीत को विफल करने और युद्ध को भड़काने का आरोप लगा रहे हैं।
सऊदी अरब की एंट्री क्यों महत्वपूर्ण?
सऊदी अरब अब तक खुद को ईरान के साथ सीधे सैन्य संघर्ष से दूर रखने की कोशिश करता रहा था। लेकिन सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर इराक स्थित ईरान समर्थित गुटों के कथित ड्रोन हमलों के बाद रियाद ने अपनी नीति बदल दी। अमेरिकी सेना के साथ संयुक्त हमला इस बात का संकेत है कि सऊदी अरब अब केवल अपनी हवाई सीमा और तेल प्रतिष्ठानों की रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि हमलावर संगठनों के ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई के लिए भी तैयार है।
सऊदी अरब की यह सक्रिय भागीदारी ईरान को उसके पश्चिमी पड़ोसी इराक में नई चुनौती दे सकती है। इराक में ईरान समर्थित संगठनों की मजबूत सैन्य और राजनीतिक पकड़ है। ऐसे में उनके ठिकानों पर अमेरिकी-सऊदी हमले इराक को भी प्रत्यक्ष संघर्ष के मैदान में बदल सकते हैं।
होर्मुज और तेल आपूर्ति पर मंडराया संकट
ईरान युद्ध का सबसे बड़ा वैश्विक खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य और दूसरे समुद्री व्यापार मार्गों को लेकर है। ईरानी बलों द्वारा तेल टैंकरों को रोके जाने तथा ईरान समर्थित हूती गुटों की गतिविधियों के कारण तेल और गैस की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, बढ़ते तनाव के बीच अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब ८८ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यदि होर्मुज या बाब-अल-मंदेब मार्ग लंबे समय के लिए बाधित होता है तो भारत सहित दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों को महंगे कच्चे तेल, एलपीजी संकट, परिवहन लागत और बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। युद्ध की हर नई चिंगारी सीधे आम उपभोक्ता की जेब तक पहुंच सकती है।
कूटनीति फिर नाकाम, दोनों पक्षों के पास क्या है योजना?
ओमान, कतर, पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से बातचीत बहाल कराने की कोशिशें की जा रही थीं। अमेरिका ने दावा किया था कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, जबकि तेहरान ने प्रत्यक्ष वार्ता की खबरों को खारिज करते हुए कहा था कि केवल मध्यस्थों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है। होर्मुज जलमार्ग, प्रतिबंधों और ईरानी परमाणु तथा सैन्य क्षमताओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच दूरी बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका लगातार हमलों के जरिए ईरान को समझौते के लिए मजबूर कर सकता है या इससे तेहरान और उसके समर्थित गुटों के हमले और बढ़ेंगे? दूसरी ओर, ईरान के सामने भी यह चुनौती है कि वह अमेरिकी सैन्य दबाव का जवाब देते हुए अपनी अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और क्षेत्रीय सहयोगियों को कब तक बचाए रख सकता है। फिलहाल दोनों पक्षों के पास युद्ध समाप्त करने की स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं देती। अमेरिका सैन्य दबाव के साथ बातचीत की बात कर रहा है, जबकि ईरान मिसाइलों और अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए जवाब दे रहा है। इस बीच सऊदी अरब के प्रत्यक्ष युद्ध में उतरने से संघर्ष की वह सीमा टूट गई है, जिसे अब तक खाड़ी देशों ने बचाए रखने की कोशिश की थी।
युद्ध के पांच बड़े खतरे
पूरे क्षेत्र में विस्तार: इराक, जॉर्डन, सऊदी अरब, यमन और इजरायल सीधे संघर्ष में फंस सकते हैं।
तेल आपूर्ति का संकट: हाेर्मुज और बाब-अल-मंदेब बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार हिल सकता है।
ईरानी गुटों का पलटवार: इराक, सीरिया और यमन में अमेरिकी तथा सऊदी ठिकाने निशाने पर आ सकते हैं।
कूटनीतिक रास्ते बंद: हर सैन्य कार्रवाई वार्ता की संभावनाओं को और कमजोर कर रही है।
भारत पर महंगाई का खतरा: कच्चा तेल महंगा हुआ तो पेट्रोलियम उत्पाद, माल ढुलाई और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
