अजय भट्टाचार्य
याद है न, जब भाजपा विपक्ष में थी? तब गांधीवादी सत्याग्रह लोकतांत्रिक अधिकार था, जंतर-मंतर पर धरना जन-आवाज था, अन्ना हजारे के आंदोलन में भागीदारी राष्ट्रहित थी, रेल रोको आंदोलन विरोध का वैध माध्यम था और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा सोनिया गांधी से इस्तीफे की मांग करना भी लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता था। लेकिन आज कोई नागरिक अपनी न्यायोचित मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करे, तो उसे देशविरोधी, राजनीति से प्रेरित या किसी साजिश का हिस्सा घोषित कर दिया जाता है। आखिर बदला क्या है, लोकतंत्र का पैमाना या केवल सत्ता का पक्ष? इस प्रश्न का उत्तर भी देश को मिलना चाहिए। विरोध तब लोकतंत्र था, आज देशद्रोह वैâसे हो गया?’
गटर भाषाविद
भारतीय राजनीति में गटर की भाषा नाला बहाने वाला भाषाविद ज्ञानिक संस्कारी पार्टी की आईटी सेल का प्रमुख है। भाषाई मर्यादा, संस्कार, सभ्यता इन लोगों के लिए कुछ मायने ही नहीं रखते थे। किसी को पप्पू पिंकी, किसी को बारबाला, किसी को टोंटी चोर, किसी को पचास लाख की गर्ल प्रâेंड बोलकर भाषा के लालित्य की ऐसी-तैसी कर दी। जो इस पर सवाल उठाये वो देशद्रोही, टूलकिट। उसे और पार्टी को लग रहा था यही चलता रहेगा हमेशा। लेकिन इनका तीर इनपर ही उल्टा चल गया। जितनी गालियां इन्होंने १२ साल में दूसरो को नहीं दी उससे १० गुना ज्यादा गालियां इनके गढ़े महामानव को मिलीं। इसलिए अब पद और पद की गरिमा ध्यान आ रही है। लेकिन गालियों से भरी वेबसिरिज देखकर जवान हुई जेन-जी इन गालीबाज मिलेनियल्स पर भारी पड़ गई।
मंदिर लाभार्थी
राम मंदिर बनने के बाद किसको क्या मिला यह चार लोग अच्छी तरह जानते हैं। पहले वाले को राज्यसभा की सदस्यता मिली, दूसरे वाले को श्रेय के साथ-साथ सत्ता मिली, तीसरे वाले को जनता के पैसे से जेड प्लस सुरक्षा के साथ पांच सितारा सुविधा, देश भर में आलीशान दफ्तर मिले और चौथे वाले को जो कुछ मिला आप जानते ही हैं, जो भी मिला छप्पर फाड़ के मिला। इधर फेसबुक पर डीपी लगाने वाले हजारों चौकीदार भी हैरान हैं कि उनके होते हुए भी चढ़ावा की चोरी हो गई ? दूसरी ओर बेचारे अनपढ़ समर्थकों को जब से पता चला है कि चढ़ावा में भी हाथ साफ कर दिया तब से सदमे में हैं और नजर भी नही आ रहे हैं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
