-प्रो. दयानंद तिवारी
शब्द मशीन दे सकती है, संवेदना मनुष्य ही जगाता है
आज लेखन की दुनिया में एक नई सुविधा हमारे सामने है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जिसे सामान्यत: एआई या चैटजीपीटी कहा जाता है। कुछ ही क्षणों में यह विषय पर जानकारी जुटा सकती है, लेख की रूपरेखा बना सकती है और भाषा को संवार सकती है। इससे लेखन की गति बढ़ी है; पर एक प्रश्न भी उतनी ही तेजी से उठता है कि क्या मशीन द्वारा रचे गए शब्दों को साहित्य कहा जा सकता है, क्या समाज की अनुभूति, पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षा को समझे बिना लिखा गया लेख सचमुच साहित्य बन सकता है। यह प्रश्न तकनीक के विरोध का नहीं, साहित्य की आत्मा को पहचानने का है। साहित्य केवल शब्दों का सुंदर क्रम नहीं होता। वह मनुष्य के भीतर से निकलकर मनुष्य तक पहुंचने वाली अनुभूति है। उसमें समाज का चेहरा, समय की धड़कन, जीवन की करुणा और भविष्य के प्रति आशा बोलती है। सूचना देना सरल है; सूचना को संवेदना, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना कठिन। यही अंतर जानकारी और साहित्य के बीच की सीमा तय करता है।
अनुभव से जन्मती है साहित्यिक सच्चाई
साहित्यकार समाज का दर्शक भर नहीं, उसका सहभागी होता है। वह गलियों की धूल, श्रमिक के पसीने, किसान की प्रतीक्षा, मां की चिंता, विद्यार्थी के सपने और वृद्ध की निस्तब्धता को देखता ही नहीं, बल्कि उनके साथ भीतर तक जुड़ता है। किसी घटना का विवरण देना एक बात है; उस घटना से उपजी मानवीय पीड़ा को पाठक के हृदय तक पहुंचाना दूसरी। यह दूसरी प्रक्रिया अनुभव, संवेदना और आत्ममंथन की मांगती है।
मशीन आंकड़ों के आधार पर बता सकती है कि बेरोजगारी कितनी है, महंगाई का प्रभाव क्या है या शिक्षा में कौन-सी कठिनाइयां हैं। लेकिन एक बेरोजगार युवक के घर लौटने पर पिता की आंखों में उतरती चिंता, या फीस न भर पाने पर विद्यार्थी के मन में उठता संकोच इन अनुभवों का जीवंत अर्थ साहित्यकार अपनी सामाजिक दृष्टि और मानवीय अनुभूति से रचता है।
सूचनाओं से पृष्ठ भरते हैं, अनुभूति से मन;
आंकड़े बताते हाल, साहित्य जगाता स्पंदन।
यह मौलिक पंक्तियां साहित्य के उसी अंतर को रेखांकित करती हैं। साहित्य जीवन का केवल वर्णन नहीं करता; वह जीवन को समझने की दृष्टि देता है।
एआई साधन है, साहित्यकार का स्थान नहीं
यह स्वीकार करना चाहिए कि एआई उपयोगी साधन है। वह प्रारंभिक शोध, भाषा-सुधार, अनुवाद, विचारों के वर्गीकरण और लेखन की तैयारी में सहायता दे सकता है। लेकिन साधन और सर्जक में अंतर है। कलम अपने आप लेखक नहीं होती; उसी तरह शब्द प्रस्तुत कर देने वाली तकनीक भी अपने आप साहित्यकार नहीं बन जाती। साहित्य का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि वाक्य कितने प्रवाहपूर्ण हैं, बल्कि इससे भी तय होता है कि उनके पीछे वैâसी दृष्टि, वैâसी संवेदना और कैसी जिम्मेदारी है।
यदि लेखक एआई से मिली सामग्री को समझे, जांचे, अपने अनुभव से जोड़े और अपने विचारों की कसौटी पर परखे, तो तकनीक उसकी सहायक हो सकती है। लेकिन यदि वह बिना आत्मसात किए मशीन के तैयार शब्दों को अपना लेखन बताकर प्रस्तुत करे, तो प्रश्न केवल लेखकीय श्रेय का नहीं रहता; तब पाठक के विश्वास और साहित्य की प्रामाणिकता का प्रश्न भी उठता है। लेखक को अपने लिखे विचारों की जिम्मेदारी उठानी होती है। मशीन न समाज के सामने उत्तरदायी होती है, न किसी शब्द से आहत व्यक्ति के सामने।
साहित्य सूचना से आगे बढ़कर दिशा देता है
साहित्य समाज का दर्पण है, पर वह केवल प्रतिबिंब नहीं दिखाता; वह प्रश्न भी करता है। वह अन्याय को पहचानने, रूढ़ियों पर विचार करने और मानवीय मूल्यों को जीवित रखने की प्रेरणा देता है। जब साहित्य किसी समस्या को सामने रखता है, तब उसका उद्देश्य पाठक को केवल जानकारी देना नहीं होता। वह उसके भीतर विवेक जगाता है क्या उचित है, क्या अनुचित; किसका अधिकार दब रहा है और परिवर्तन की शुरुआत कहां से हो सकती है।
यहीं साहित्य में सम्पूर्णता आती है। रचना में विचार हो, पर संवेदना न हो, तो वह सूखी व्याख्या बन सकती है। भाव हो, पर सामाजिक दृष्टि न हो, तो वह क्षणिक मनोरंजन तक सीमित रह सकता है। प्रभावशाली साहित्य में भाषा, अनुभव, विचार और लोकहित एक साथ उपस्थित होते हैं। ऐसा साहित्य मनुष्य को अपने समय से जोड़ता है और बेहतर समाज की कल्पना के लिए प्रेरित करता है।
जब शब्द विवेक से मिलते हैं, तब विचार मशाल बनते हैं;
जब पीड़ा जनमन से जुड़ती है, तब साहित्य बदलाव रचता है।
तकनीक के युग में लेखक की जिम्मेदारी
आज पाठक के सामने सामग्री का विशाल संसार है। ऐसे समय में लेखक की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे हर सूचना को सत्य मानकर नहीं लिखना चाहिए; हर आकर्षक वाक्य को साहित्य नहीं समझना चाहिए। उसे तथ्य की जांच करनी चाहिए, भाषा में मानवीय गरिमा रखनी चाहिए और अपने लेखन के सामाजिक प्रभाव पर विचार करना चाहिए। तकनीक सुविधा दे सकती है, पर विवेक का निर्णय लेखक को ही करना होगा।
संस्कृत की ये मौलिक पंक्तियां इसी विचार को व्यक्त करती हैं
यन्त्रं ददाति शब्दार्थान्, मानवो ददाति भावनाम्।
अनुभवेन विना लेख:, न स्पृशति जनमानसम्
अर्थात् यंत्र शब्द और अर्थ दे सकता है; मनुष्य उनमें भावना भरता है। अनुभव के बिना लिखा गया लेख जनमानस को गहराई से नहीं छूता।
एक अन्य मौलिक संस्कृत पंक्ति कहती है-
साहित्यं न केवलं वाक्यं, जीवनस्य प्रतिबिम्बकम्।
लोकहितं यत्र भाव:, तत्र लेखनमर्थवत्तमम्
भावार्थ: साहित्य केवल वाक्य नहीं, जीवन का प्रतिबिंब है। जहां लोकहित की भावना है, वही लेखन सार्थक बनता है।
अंतत: साहित्य मनुष्य का संवाद है
यह कहना उचित नहीं होगा कि तकनीक के सहारे तैयार हुई हर रचना साहित्य नहीं हो सकती। किसी भी साधन का मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कौन, किस दृष्टि से और किस जिम्मेदारी के साथ करता है। एआई लेखक की सहायता कर सकता है; लेकिन समाज को देखने वाली आंख, पीड़ा से जुड़ने वाला हृदय और परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाली चेतना मनुष्य की ही देन है। साहित्यकार यदि मशीन की सहायता ले, तब भी रचना को अपने विवेक, जीवनानुभव और संवेदना से जीवित करना उसी का दायित्व है।
साहित्य तभी सार्थक है जब वह पाठक को केवल कुछ नया बताकर न छोड़े, बल्कि उसे कुछ नया सोचने, महसूस करने और करने की प्रेरणा दे। समाज को जानने वाला साहित्यकार जब अपने समय की सच्चाइयों को ईमानदारी से शब्द देता है, तभी लेखन जनजीवन में उतरता है। मशीन सामग्री दे सकती है; पर उस सामग्री को मानवता की आवाज बनाना साहित्यकार का काम है।
कलम की शक्ति शब्दों में नहीं, उनके पीछे खड़े सत्य में है;
साहित्य की उम्र पन्नों से नहीं, जनमन पर पड़े प्रभाव से है।
