-उमा सिंह
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी करनाल की रैली में पूरे तेवर के साथ गरजे। बोले, कांग्रेस की रैली वोट बचाने की नहीं, घुसपैठियों को बचाने की रैली है। भाजपा का संकल्प है कि घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर करेंगे। वाह शाह जी! संकल्प तो बड़ा जोरदार है, लेकिन जनता के मन में एक छोटा-सा सवाल कुलबुला रहा है। पिछले १२ साल से केंद्र में आपकी ही सरकार है। प्रधानमंत्री आपके, गृह मंत्रालय आपका, सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी, खुफिया तंत्र आपका। फिर घुसपैठियों को ढूंढ़ने के लिए करनाल की रैली तक इंतजार क्यों करना पड़ा?
१२ साल सत्ता में रहने के बाद भी घुसपैठियों की तलाश जारी है, शाह जी! अब सवाल है कि घुसपैठिए ढूंढ रहे हैं या चुनावी मुद्दे? क्या घुसपैठिए इतने शातिर निकले कि बारह साल तक सरकार की नजरों से बचते रहे? या फिर उन्हें पकड़ने का मुहूर्त हर चुनाव के आसपास ही निकलता है?
ऐसे में सड़क से लेकर संसद तक बस एक ही सीधा सा सवाल है कि जब सत्ता आपके हाथ में है तो अपनी जिम्मेदारी का हिसाब कांग्रेस से क्यों मांग रहे हैं? और गजब देखिए! विपक्ष एसआईआर में वोटरों के नाम कटने, नागरिकों के मताधिकार और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाए तो उसे घुसपैठियों का संरक्षक बता दिया जाता है। यानी सरकार से सवाल पूछना भी अब गुनाह हो गया! शाह जी, घुसपैठ रोकना गृह मंत्री की जिम्मेदारी है, चुनावी भाषण का मसाला नहीं। जनता को नारे नहीं, कार्रवाई का हिसाब चाहिए।
